मंदाकिनी पार्ट 15 / Mandakini part 15

रात बहुत हो जाने से मीना मेरे ही घर पर रूक गयी थी। मां मुहूर्त समय में दुर्गा विसर्जन के लिये जाने की हिदायत दे कर अपने कमरे में सोने जा चुकी थी और अंजली भाभी को भी हमने आराम करने के लिये भेज कर छत पर सामान समेटा। राघव भैय्या और शेखर भी अपने-अपने कमरे में जा चुके थे। मेरी और मीना की नींद दूर कहीं सपनों के गांव में खोई थी। मीना ने छत की तरफ देखते हुए ही मौन तोड कर मुझ से पूछा … ‘‘अरूणिमा!!! ये चांद ये सूरज क्या यूं ही निकलते और ढलते रहेंगे? क्या इन तारों भरी रातों के भाग्य में तुम्हारे और शेखर की मिलन यामिनी का साक्षी होने की दिषा में कोई बात बढी या सुबह और शांम की अरूणिमा में पलों के पंछियों का कलरव ही शेष रह जाएगा?’’
मैंने मीना की तरफ करवट बदल कर कहा … ‘‘पता नहीं मीना!! शेखर के इतने समीप आ कर भी मुझे लगता है कि वो मुझ से कहीं दूर जा रहे हैं? वो पल प्रति पल मेरे तन-मन, हृदय और प्राणों में घुलते जा रहे हैं किंतु मेरे मस्तिष्क और बुद्धि के समस्त द्वार व वातायन खोलने पर भी समझ में नहीं आ रहे। कल रात तो हम दोनों के मध्य कोई दूरी ही नहीं रह गयी थी और भावनाओं के प्रपात प्रवाह में बह कर हम ना मालूम कहां गिर जाते? देहिक देष के दक्षिणी वाम मार्ग में अधोमुखी अष्टदलीय पद्मिनी की पंखुडियों में कामना-वासना के मिथुन भंवर ने कोहराम मचाया किंतु स्व अनुभूति के मारूति के एक ही वुभूकार ने उस भंवर को कामना पद्मिनी से दूर कर दिया।’’
मीना ने मेरी तरफ करवट बदल कर मेरी अलकों में अंगुली फिराते हुए प्यार से कहा … ‘‘मैं देख रही हूं कि तुम्हारी भाषा भी रहस्यवादी योगियों की सांकेतिक भाषा हो गयी है और संभव है कि शेखर किसी स्पष्ट आमंत्रण की प्रतीक्षा कर रहे हों!! तुम हिंदी भाषियों की यही समस्या है कि संस्कारों की बेडियों में जकडे होने के नाम पर तुम उस समय मौन रहते हो जब तुम्हारे बोलने का महत्व सर्वाधिक होता है।’’
मीना के कथन से मैं थोडी आहत हुई और मैंने मीना के मन को टटोलते हुए पूछा … ‘‘क्या स्वतंत्रता का अर्थ उछृंखलता और अवसर का अनुचित लाभ उठाना होता है मीना? क्या नैतिक और सामाजिक मूल्यों का कोई महत्व नहीं? मैं तुम्हारे शब्दों में छिपी चुनौती को स्वीकार कर के भी तुम्हें परास्त नहीं करना चाहती। क्योंकि ऐसी चुनौतियों की हार या जीत का मार्ग केवल और केवल पतन से हो कर पतन पर ही पहुंचता है। किंतु मीना स्वयं को चुनौती देने के लिये स्वतंत्र हो। मीना चाहे तो आज की रात शेखर को शीषे में उतारने का परीक्षण कर ले।’’
मैंने मीना के गर्व को चुनौती दी थी और मीना ने उदास हो कर कहा … ‘‘मैंने पहले भी कहा था। मीना के सीने में मदिरा भरी होने पर भी वो किसी मधुप की प्रतीक्षा में आल्मारी में उदास खडी रहती है और अपने सीने में भरी सारी मदिरा प्यालों में भर कर रीत जाने पर भी अपनी उदासी किसी से नहीं कहती और चुपचाप किसी कोने में पडी रहती है। भरी होने पर मीना की हंसी में खनक नहीं होती और खाली मीना की खनक खोखली होती है। लेकिन मीना खाली हो या भरी हुई, वो मीना ही क्या जो किसी मधुप को अपने शीषे में न उतार ले।’’
‘‘हिरणी के समान चञ्चल नयनों के कटाक्ष, ढीली कौंधनी और पायजेब के घुंघरुओं की मधुर झनकार से राजहंसों को शर्मानेवाली नवयुवती सुंदरियाँ, जिसकी देह पर केसर लगी है, गोर गोर स्तनों पर मणि-मुक्तों के हार झूल रहा हों और नूपुर रुपी हंस जिसके चरणकमलों में मधुर मधुर शब्द कर रहे हैं किसके मन को विवश नहीं कर देती?’’
‘‘शास्त्रों की बडी-बडी बातें करने वाले वक्ता पण्डित, योग व धर्म का ज्ञान देने वाले योगी यतियों का स्त्री-त्याग का उपदेश केवल दिखावे के कथन मात्र ही होते हैं। नवरत्नों से जड़ित करधनी वाली कमलनयनी स्त्रियों की मनोहर कदली जंघाओं को कौन त्याग सकता है?
‘‘भीष्म, हनुमान और गोरक्ष जैसे अपवाद के अतिरिक्त कोई भी सत्मार्गी चरित्रवान पुरुष सत्मार्ग में तभी तक रह सकता है, इन्द्रियों को तभी तक वश में रख सकता है, लज्जा को उसी समय तक धारण कर सकता है, नम्रता का अवलम्बन तभी तक कर सकता है, जब तक कि लीलावती स्त्रियों के भौंह रुपी धनुष से कानों तक खींचे गए, श्याम वरौनि रुपी पंख धारण किये, धीरज को छुड़ाने वाले नयन रुपी बाण हृदय में नहीं लगते। ये पारिवारिक प्रतिष्ठा, उच्चता व गरिमा की बड़ाई, पण्डिताई, कुलीनता और विवेक आदि मनुष्य के हृदय में तब तक ही रह सकते हैं, जब तक शरीर में कामाग्नि प्रज्वलित नहीं होती।’’
‘‘मृगनयनी कामिनियों का प्रेमपूर्ण प्रसन्न मुख, उनके मुंह की श्वास वायु, उनकी मीठी प्रेमपूर्ण बातें, उनके होठों की कलियों का रस, उनका पुष्प् पंखुरियों जैसा कोमल शरीर और उनका यौवन विलास किसी को भी भ्रमित करने के लिये पर्याप्त है। क्योंकि यद्यपि दीपक, अग्नि, तारे, सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश होने पर भी जीवन में किसी मृगनयनी सुन्दरी के चक्षुदीप के बिना उसका जगत अन्धकार होता है।’’
मैं मीना के आत्मविष्वास की जड़ों को जान कर आष्चर्यचकित थी लेकिन मैं शेखर के आत्मसंयम की भी स्वयं साक्षी होने से कहा … ‘‘तुम्हारा आत्मविष्वास श्लाघ्य है मीना!! और तुम्हारे रूप की सेना किसी भी आत्मसंयमी इद्रियनिग्रही को विचलित व पराजित करने में पूर्ण सक्षम भी है फिर भी मुझे शंका है कि तुम शेखर को मूल्यों के षिखर से गिरा सकोगी।’’
मीना चुनौतीपूर्ण हास्य के साथ उठी और नृत्य की गहरे नीले रंग वाली मेरी ड्रेस पहन कर पूरा श्रंगार किया और ड्राईंग रूम की खिडकी से झांक कर देखने का प्रयास किया। खिड़की के पर्दों से छन कर आ रही रोषनी के साथ भंवरों के गूंजने की आवाज़ आ रही थी लेकिन कुछ दिख नहीं रहा था। हम दोनों ने मिल कर बिना आवाज़ किये बरामदे में रखी नाष्ते की टेबल पर कुर्सी रखी। मैंने कुर्सी को पकडा और मीना ने कुर्सी पर चढ़कर संवातन (वेंटलेशन) से कमरे में झांक कर देखा तो जड़वत हो कर देखती रह गयी। मैंने फुसफुसा कर पूछा भी तो मीना ने उत्तर नहीं दिया। थोडी देर बाद निष्प्राण सी कुर्सी से उतरी और मुझे कुर्सी पर चढाया। अंदर का अविष्सनीय दृष्य देख कर मेरी आंखें विस्फारित हो गयी। शेखर नीचे आंगन में दरी पर घ्यान मुद्रा में बैठे थे, उनका अर्धनग्न शरीर पसीने से सराबोर तथा बुखार से तपते किसी रोगी की तरह कांप रहा था। शरीर से बह रहे पसीने से दरी भीगी हुई और उनकी लंबी-लंबी सांसों के आरोह-अवरोह से सैंकड़ों भंवरों के गुनगुनाने की आवाज़ आ रही थी।
मेरी समझ में कुछ नहीं आया, मैं बरामदे में कुर्सी पर बैठ गयी और मीना ने दरवाज़ा थपथपाया तो दरवाज़ा खुल गया। मीना कुछ देर किंकर्तव्यविमूढ खडी रही और फिर अपनी ओढ़नी से शेखर को हवा झलने लगी तो शेखर ने धीरे-धीरे आंखें खोली तो शेखर की आंखों में आंसू बह निकले। हम दोनों के लिये यह बहुत अप्रत्याषित था। मेरा मन कह रहा था कि मैं अंदर जा कर शेखर के आंसुओं को अपनी झोली में ले लूं लेकिन मैं मीना से वचनबद्ध थी और मीना ने भी वही किया। मीना ने अपनी ओढनी के पल्लू में शेखर के आंसू समेटते हुए कहा … ‘‘षेखर!! ये आंसू? क्या पत्थर भी रोते हैं?
शेखर ने उसी अवस्था में बैठे रह कर कहा … ‘‘पत्थर रोया नहीं करते लेकिन झरने पत्थरों से ही निकलते हैं।’’
मीना ने शेखर के शरीर से पसीना पौंछते हुए बात बढायी … ‘‘लेकिन क्या मैं शेखर नाम के इस पत्थर के रोने का कारण जान सकती हूं?’’
शेखर ने मीना को अपने शरीर पर हाथ लगाने से रोकते हुए कहा … ‘‘प्रारब्ध मीना!! प्रारब्ध।’’
मीना ने शेखर से अपना छुडाने का प्रयास नहीं किया बल्की शेखर को उठाते हुए बोली … ‘‘प्रारब्ध? कैसा प्रारब्ध शेखर?
शेखर ने उठते हुए मीना के दोनों हाथ अपने हाथों में ले कर थोडा सा निराषापूर्वक कहा … ‘‘आज फिर मेरी योग साधना का अगला चरण नभमुद्रा सिद्ध होने से रह गयी मीना!’’
मीना अपने निष्चित लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए शेखर के और समीप आ कर आंखों को नचाते हुए बोली … ‘‘नभ मुद्रा? ये क्या होता है?’’
शेखर ने मीना से हाथ छुडाते हुए दीवान पर बैठ कर कहा … ‘‘योगी जब शरीर, जिव्हा और षिर को एक सीध में ले कर जिव्हा को कण्ठघंट में उर्ध्वाकार लगा कर अधोमुख कूप से सहस्त्रार की ओर बढ़ते हैं उस खेचरीमुद्रा को ही योगीजन नभमुद्रा कहते हैं।’’
मीना शेखर के बाईं ओर समीप बैठते हुए बोली … ‘‘नभमुद्रा सिद्ध होने से योगी को क्या मिलता है?’’
शेखर ने आंखें बंद करते हुए कहा … ‘‘योगी जब खेचरी या नभमुद्रा के चरम पर पहुंचता है तो आत्मा का समस्त भार स्वेद अर्थात पसीने के रूप में बाहर आ जाता है और शरीर का विमान हवा में उठ कर वायूगामी हो जाता है। योग का वही सोपान आज मुझे प्राप्त होने से रह गया।’’
मीना ने सांत्वना जताते हुए शेखर के कांधे पर हाथ रख कर एक जिज्ञासू की तरह पूछा … ‘‘क्या इस का कोई अन्य विकल्प नहीं है?’’
शेखर ने उसी प्रकार आंखें बंद रखते हुए कहा … ‘‘ईष्वर ने कोई भी तत्व, कार्य और फल विकल्परहित नहीं बनाया किंतु परिणाम का परिमाण अपनाये गये विकल्प की श्रेष्ठता के अनुपात में उच्च, हीन, निकृष्ट और हेय हो सकता है। यह और कि अपनाये गये विकल्प की श्रेष्ठता का मार्ग भी उसी अनुपात में स्थाई, अस्थाई, क्षणिक और सामयिक होगा।’’
मीना ऐसी नीरस बातों से अकुला कर लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए अपनी सांसों की सुगंध शेखर के नासिका रंध्रों तक पहुंचाने के लिये दीर्घ श्वास छोड़ते हुए बोली … ‘‘ये योग और अध्यात्म की बातें हम सांसारिक लोगों के लिये नहीं बल्की सन्यासियों के लिये हैं शेखर। सम्भोग की चरम अवस्था भी खेचरी और नभमुद्रा से प्राप्त होने वाली अनुभूति देती है। मन, हृदय और आत्मा का समस्त भार रतिश्रम के स्वेद से बाहर आ जाता है और आकाष में उड़ने जैसा स्वर्गिक अनुभव होता है।’’
मीना अपनी चेष्टा में आगे बढ़ रही थी। अपने दाहिने हाथ से शेखर की पीठ पर नख फिराते हुए कहा … ‘‘प्रियतमा के सुराहीदार गले में अधखिले मालती के फूलों की माला पड़ी हो, कमल से कोमल शरीर पर केसर मिला चन्दन लगा हो और सर्पिलाकारा कुंडली लता सी छाती से चिपटी हो तो समझ लो, आकाष में उड़ने और स्वर्ग का सुख यहीं मिल गया।’’
मीना ने अगला प्रहार शेखर के वक्ष पर अपने बांए हाथ से सहलाते हुए किया और कहा … ‘‘कंचुकी से कसे स्त्री के पुष्ट स्तनों, कदली सम मनोहर चिकनी जाँघों और खिली हुई कुमुदनी जैसे सुन्दर मुख की योगयुति प्रभृत्ति सरिता में स्नान भाग्यवान पुण्यात्मा योगी पुरूषों को ही प्राप्त होता है। शुक्ल चंद्र की दषमी की चांदनी रात में यौवन प्रपात सी मदमाती तरूण स्त्री की नाभी के भंवर में नैनों के चंचल मिथुनमीन और क्षीरकुंभ उरोजों पर लहराती केष नागिनों के साथ दुर्लभ स्नान का मुहुर्त श्रंगार, शास्त्र, शस्त्र व नीति प्रवीण योगी की प्रतीक्षा कर रहा है शेखर। आओ और इस सुखसागर में किलोल का आनंद लो, न मालूम ये मुहूर्त फिर कभी आए ना आए।
कहते हुए मीना ने शेखर की बांईं जंघा पर अपना सर रख दिया। शेखर ने मीना के चेहरे पर से उसके बालों को हटा कर उसकी आंखों में झांकते हुए कहा … ‘‘क्या इस क्षणिक सुख के लिये स्थाई आनंद का मूल्य …?’’
मीना ने शेखर का बांयां हाथ अपने हाथ में ले कर उसे श्वासों के आरोह-अवरोह के साथ उठते-गिरते अपने उरोजों पर रखते हुए कहा … ‘‘सुख और आनंद के मूल्य की तुलना व्यवसाईयों के लिये छोड़ दो शेखर! ये सम्भोग है, इस में सुख और आनंद की भागीदारी बराबर है।’’
शेखर ने दाहिने हाथ से मीना के सर को गले के पास से धीरे-धीरे सहलाते हुए कहा … ‘‘ और सामाजिक नैतिक मूल्य व इन्द्रिय निग्रही संयम …।’’
मीना ने शेखर की बात काटते हुए उनका दाहिना हाथ अपनी नाभी, कटि, नितम्ब व जंघा कंदरा की ओर सरकाते हुए कहा … ‘‘कौन से नैतिक मूल्य और संयम की बात कर रहे हो शेखर? विश्वामित्र, पराशर, मरीचि, शृंगि जैसे बड़े-बड़े पय व पवन आहारी विद्वान, ऋषि और मुनि जो वायु जल और पत्ते खाकर गुजरा करते थे, स्त्री की माया के मुख-कमल को देखकर मोहित हो गए, तो मनुष्य अन्न, घी, दूध, दही, मांस, मदिरा और अनेक प्रकार के व्यञ्जन खाते और पीते हैं, वो मोहिनी के दास कर्म के चंद्र कैसे अपनी इन्द्रियों को वश में रख सकते हैं? यदि वे अपनी इन्द्रियों को वश कर सकें, तो हिमालय पर्वत भी हवा में उड़ कर समुद्र में तैर सकते हैं। इसलिये आओ शेखर, ईर्ष्या-द्वेष, निष्ठा व पक्षपात की दुर्बल भावनाओं को त्याग कर कर्म, विकर्म तथा अकर्म के विचार की मर्यादा को भूल कर सुरत-वेग से बिखरे हुए कुंतल केश, लज्जा के कारण मीलित नेत्र, धमनियों में मिथुनवेग जनित स्वेद-बिन्दुओं से आर्द्र गण्डस्थलों वाली वनिता के अधर मधु का पान करते हुए नितम्बों के पर्वतों, कटि प्रदेश की गुहा, कन्दरा का आश्रय ले कर कामवेग से कलकल बह रही विलास की उद्दात्त लहरों में डुबकियां लगा कर पवित्र संगम स्नान का पुण्य अर्जित करो।’’
शेखर ने मीना की चेष्टाओं से निष्चेष्ट रहते हुए कहा … ‘‘जिन इतिहास पुरूषों का तुमने नाम लिया वो एक अकाट्य सत्य है। मनुष्य का मान-सम्मान, गौरव, विद्वता, कुलीनता, विवेक, सद्विचार आदि तभी तक बने रहते हैं जब तक उसके अंगों में कामाग्नि प्रज्वलित नहीं होती। काम के वषीभूत व्यक्ति अपना मान-सम्मान सब कुछ खो देेेता है। संसार सागर का अंतिम छोर बहुत दूर नहीं है, समीप ही है। यदि मध्य में अशक्य महानदियों की भांति मदिरा से पूर्ण नयन वाली ये सुन्दरियां न हो तो इस सागर के पार हो जाना कठिन न होता। जिसके रूप लावण्य की स्मृति भी संताप बढाने वाली है, प्रत्यक्ष दिखाई पड़ने पर काम को बढा कर उन्मत्त बना देती हैं तथा स्पर्श करने पर मोहित कर लेती है, पुरूष के उद्धार की ऐसी शत्रु होने पर भी स्त्री को प्रिया कहा जाता है। यह आष्चर्यजनक है।’’
फिर शेखर ने किंचित हंसते हुए कहा … ‘‘दूसरी ओर पुरूष की स्थिति उस श्वान के सदृष्य है जो खाना न मिलने के कारण दुर्बल, काना, लगड़ा, कटे कान वाला, बिना पूंछ वाला, घायल और हजारों कृमियों से व्याप्त शरीर वाला, भूख का मारा हुआ, बुढ़ापे के कारण शिथिल, मिटटी के घड़े का मुंह जिसके गले में फंसा हुआ है किंतु, मैथुनार्थ मादा श्वान के पीछे-पीछे दौड़ता है।’’
शेखर ने पुनः गम्भीर होते हुए अपना कथन जारी रखा … ‘‘कामाग्नि के तिमिर रोग से उत्पन्न अज्ञान की कालिमा के कारण मनुष्य को नारी का देह संसार में केवल आनंदक्रीड़ा का छोटा सा आंगन मात्र दिखाई देता है। किंतु इसी कालिमा को विवेक रूपी अंजन बना कर आंखों के दीपक में ज्ञानज्योति प्रदीप्त करता है तो मन की चंचल दीपषिखा वायुरहित हृदयकक्ष में स्थिर हो कर अपनी धूम्र से उसके अन्तरलोक में कलुषता की कालिमा को लील लेती है और निषेष प्रकाष में देख पाता है रतिश्रम से षिथिल मांस पिण्ड से निसृत होता एक व्यर्थ प्रवाह।’’
इतना कहते हुए शेखर ने मीना की तरफ हाथ बढ़ाया। मीना की पीठ मेरी तरफ होने से मैं पर्दे की झिरी में देख नहीं पाई कि शेखर ने क्या किया? लेकिन मीना जैसे किसी नवचेतना से अंतरभूत हुई हो। वह उठी और अपने वस्त्रों को ठीक करते हुए आंगन में बिछी दरी पर बैठ कर आंखें बद कर के बोली … ‘‘मैं अपने अंदर एक सुप्त चेतना को जागृत होते देख रही हूं शेखर! आप के एक स्पर्ष मात्र ने मुझे मेरा ही दर्षन करवा दिया। मैं नारीत्व को आप की दृष्टि से देखना चाहती हूं। गुरू बन कर मेरा मार्गदर्षन करो शेखर!!! मेरा मार्गदर्षन करो!’’
मीना ने अपना षिर शेखर के घुटनों पर रख दिया था और शेखर उसके सर को थपथपाते हुए कह रहे थे … ’‘स्वयं में नारीत्व को देखना चाहती हो या नारीत्व में स्वयं को जानना?’’
मीना के दृढ होते स्वर सुनाई दिये … ‘‘नारीत्व देखने के लिये निगाहों के आईने बहुत हैं जो एक-एक इंच देहयष्टि पर सौ-सौ उपमाओं की कविता रच देते हैं। मैं नारी की देहयष्टि में उसके अंगों की समष्टि में एक-एक व्यष्टि को जानना चाहती हूं।’’
शेखर ने मीना का चेहरा ऊपर उठाया तो मीना ने दोनों हाथ शेखर के घुटनों पर परस्पर काटते हुए रख दिये थे। तब शेखर ने उसे कांधों से पकड कर उठाते हुए दीवान पर अपने पास बिठाया और बोले … ‘‘नारी समग्र सृष्टि का प्रतीक है मीना! उसे पूर्ण रूपेण कोई नहीं जान सकता। हमारी दृष्टि का विस्तार भी हमारे सौर मंडल से बाहर नहीं हो पाया है, इसलिये मैं नारी में केवल नवग्रहों के दर्षन की जानकारी ही दे सकता हूं। कांतिमान होने से सूर्य, चंद्रमा की सुंदरता से चंद्र, मंद-मंद मंथर गति से शनि, रक्ताभ तेजस्वी नेत्र व कपोल से मंगल, कंचुकी में कुच भार समेटे वृहस्पति, धूम्रवर्णी तीखी भावभंगिमा और तीव्र मेधा वाली आंखों से बुद्ध, गौरवर्णी रूपवती होने से शुक्र ग्रह नारी की देह में निवास करते हैं। राहू और केतु पाप के छाया ग्रह हैं जो समय के प्रभाव से नारी के अस्तित्व में प्रकट होते हैं तो नारी की सद्वासना ऊर्ध्वमुखी हो जाती है। तब क्षण मात्र के लिये भी उसे किसी पुरूष के सामर्थ्यषाली पौरूष का आकर्षण मिल जाए तो किसी भी अच्छी वस्तु के दिखने पर उसे प्राप्त करने की नारी की प्रकृतिजन्य विवष सद्वासना ऊर्ध्वमुखी हो कर उसे प्राप्त करने के लिये उत्कण्ठित हो जाती है।’’
शेखर ने नारीत्व में कामदर्षन पर प्रवचन जारी रखते हुए कहा … ‘‘इस स्थिति में कोई भीष्म, हनुमान और गोरक्ष जैसा इन्द्रिय निग्रही, निष्चल, निर्लेप आत्मज्ञानी उस काम वनिता का उद्देष्य पूरा नहीं करता लेकिन मीन समान चंचल इन्द्रियों वाला साधारण मनुष्य उस वासना से संबद्ध हो जाता है। यदि उस समय एक क्षण के लिये भी उन में से किसी को भी अपने उत्तरदायित्व की स्मृति हो जाए तो तत्क्षण के लियेे वह उसी प्रकार चौंक उठता है जैसे सुख उपभोग की गहरी नींद से कोई क्षणमात्र के लियेे कोई चेतावनी सुनकर जाग पडे, किन्तु आंख खुलने पर स्वयं को सुरक्षित पाकर पुनः निद्रालीन हो जावे। आनन्दभोग में मस्त हुआ उनका उत्तरदायित्व बोध इसी प्रकार संयम को अस्वीकार करने लगता है और वासनाओें के जाल में उलझ कर आत्मविस्मृति के उन क्षणों में वह काम वनिता और मिथुनमीन बना वह मनुष्य धीरे-धीरे अपने स्व के मूल स्वरूप को भूल कर सुख और आनंद की भ्रम अवस्था में उस प्रवेष द्वार में अंदर-बाहर होते रहते हैं।’’
मीना शेखर के वक्ष से लग कर रो रही थी। कह नहीं सकती कि वो आत्मग्लानी थी या आत्मबोध? शेखर ने आंसू पौंछ कर उसे चुप कराते हुए कहा … ‘‘जाओ मीना, तेल रीत जाने पर बुझी हुई बाती किसी दूसरे दीपक में प्रदीप्त नहीं की जाती और बाती के बिना दीपक में तेल का भरा पूरा पौरूष कांतिहीन हो कर प्रकाष और अंधेरे की सीमाओं पर प्रहरीकर्म नहीं कर पाता।’’
मीना फफकते हुए शेखर के पांव छुए और बाहर आने लगी तभी देहरादून के इक्कीस षिवालयों और इक्कीस मां काली मंदिरों से घंटियों की आवाज़ ने दुर्गा विसर्जन मुहूर्त प्रारंभ होने की घोषणा की। राघव भैय्या और मां के कमरों की बत्तियां भी झप-झप कर जल उठीं तो हमने भी अपने कमरे की बत्ती जलाई और दुर्गा विसर्जन के लिये जाने की तैयारी का उपक्रम करने लगीं।
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