मंदाकिनी पार्ट 18 / Mandakini part 18

अक्टूबर माह के उस दूसरे गुरूवार को भोर की किरणें भी अभी केसरिया कंबल ओढे़ हिमालय की चोटियों पर सोई हुई थी कि घर के बाहर कुछ खट-पट के शोर और कुछ लोगों की आवाज़ों के साथ अलसाई सी मेरी आंख खुली तो मन में अनेक आषंकाएं थी। दीवार घडी ने बताया कि सुबह के साढे पांच बजे थे, मैंने अंजली भाभी को थपथपा कर उठाया तो उन्होंने माता वैष्णोदेवी मंदिर से बाबूजी के आने की बात बताई जो मां ने उन्हें बताई थी। एक ख़ुषी के साथ मन आष्वस्त हुआ तो मैं झट से चादर हटा कर उठी और बाहर बरामदे में आई। बाबूजी के बाकी साथी जा चुके थे और मां व बाबूजी मुख्य द्वार से अंदर आ रहे थे। मैं लगभग भागते हुए जा कर बाबूजी बाबूजी कहते हुए उन के पास पहुंची तो बाबूजी ने कहा … ‘‘अरे, तुम क्यों उठ गयी अरूणिमा? अभी तो सुबह होने में देर है।’’
मैंने उनसे लिपट कर उनके सीने पर सर रख कर कहा … ‘‘मेरी सुबह और शांम तो आप से है बाबूजी, देखो आप आए और सुबह हो गयी।’’
बाबूजी ने मुझे दुलारते हुए कहा … ‘‘और तुम हमारी अरूणिमा हो, सुबह और शांम की ऊषा का उजास!!’’
मां बाबूजी का ब्रीफकेस ले कर अंदर चली गयी। मैं और बाबूजी बरामदे के बाहर लॉन में तुलसी टिकटी के पास कुर्सियों पर बैठ कर बतियाने लगे। बाबूजी मेरे स्कूल के बारे में पूछ रहे थे और मैं उनकी ड्यूटी में हुई परेषानी जानना चाह रही थी। अंजली भाभी भी उठ चुकी थी और कान व नाक ने अपने तेज की सम्पूर्ण क्षमता को रसोई में कप-प्लेट व केतली की आवाज़ के साथ चाय की सुगंध के अन्वेषण में लगा दी थी। मां और अंजली भाभी चाय की ट्रे संभाले ड्राईंग रूम के दरवाज़े से बाहर आने लगी तभी सुबह की पहली किरणों ने गमलों-क्यारियों में लगे खिलने को आतुर कलियों पर ओस के मोतियों के पर्दे खिसकाये।
अंजली भाभी ने चाय की ट्रे टेबल पर रख कर बाबूजी के पांव छूए तो बाबूजी ने बैठने के लिये कहते हुए आषीवर्चन कहे … ‘‘पति, पुत्रवति, अखंड सौभाग्यवति रहो बेटी अंजली!! वेदमाता गायत्री तुम्हें गुण-दोष, अच्छे-बुरे को जानने की प्रज्ञा, दूरदृष्टि और चारित्रिक आदर्षता प्रदान करे। माता वैष्णवी हमेंषा तुम्हारे हृदय में उज्जवल भविष्य की आकांक्षा, ईष्वर में विष्वास और उच्च आदर्षों के प्रति श्रद्धा भावना भर दे। माता सरस्वती तुम्हें सौंदर्य, स्नेह व सज्जनता मिश्रित शालीनता, अविचल धैर्य और संतोष का गुण प्रदान करे। मां महाकाली तुम्हारे स्वास्थ्य, आलस्यहीनता, उत्साहयुक्त कर्तव्यनिष्ठा में वृद्धि करे। महालक्ष्मी तुम्हें वैभव, ममता, दयालुता और असहायों के प्रति सहायता की भावना से पूरित रखे। माता गौरी के आषीर्वाद से तुम्हारी संतान सद्चरित्र, विद्यावान, पराक्रमी, राष्ट्रभक्त, गो रक्षक और गोरक्षयोग में निष्ठावान हो।’’
इतना कह कर बाबूजी चाय की प्याली मुंह तक ले जाने लगे तो मां ने सूचना देते हुए कहा … ‘‘माता रानी ने अंजली की प्रार्थना सुन ली है। अब तो बस उस दिन की प्रतीक्षा है जब अरूणिमा के भाग्य का रथ हमारे द्वार पर आ कर रूके और आप ये सारे आषीर्वाद अरूणिमा को भी दें।’’
मां की बात सुन कर बाबूजी ने चाय की प्याली से ली आधी घूंट को जल्दी से गले के नीचे उतारा और मां की तरफ देखते हुए बोले … ‘‘अरे ये तो बहुत ख़ुषी की बात बताई तुम ने!! अंजली के मां-बाबूजी और तुम्हारे भैय्या-भाभी को सूचना करवाई या नहीं? डॉक्टर को दिखाया? क्या कहा डॉक्टर ने? सब ठीक तो है ना, और वो मूर्खानंद राघव!! उसका दिमाग ठीक हुआ या नहीं? अब कब आएगा वो? मैं उसकी ख़बर लेता हूं!!
मां ने हंसते हुए कहा … ‘‘आप ने एक साथ इतने सारे प्रष्न कर डाले, जिनका उत्तर मेरे वष में तो नहीं है। बस इतना कह सकती हूं अभी दो दिन पहले ही पता लगा और इस शुभ समाचार की सभी जगह चिट्ठियां भेज दी है। अब आप आ गये हैं तो आप के ऑफिस से ट्रंक कॉल कर लेना। आप लंबी यात्रा से आये हैं, कुछ विश्राम कर लो फिर दिन भर पडा है। अरूणिमा को भी स्कूल जाने के लिये तैयार होना है।’’
बाबूजी ने बड़े दार्षनिक की तरह कहा … ‘‘मन में उपजी छोटी सी प्रकाष रष्मि तन की थकान के सारे अंधियारे पर भारी होती है।’’
बाबूजी ने तुलसी टिकटी में बुझ चुके दीपक को इंगित करते हुए कहा … ‘‘रात भर अंधेरे से लड़ने वाले दीपक में तेल की शक्ति चुक जाने पर उसकी लौ धीमी हो जाती है लेकिन थोड़ा भी तेल पड़ जाए तो लौ अपनी पूरी शक्ति से उठ खडी होती है।’’
चाय का अंतिम घूंट ले कर बाबूजी ने अपने ही प्रवाह में कहा … ‘‘आज का दिन बहुत अच्छा है, आज तारीख भी 12 अक्टूबर है, तिथि भी शुक्ल पक्ष की द्वादषी और दिन गुरूवार है। हमारे आराध्य सिद्धेष्वर महादेव का दिन प्रदोष जो सभी दोषों का प्रक्षालन करने वाला है। देखो पूर्व में उगते हुए आदित्यदेव का रथ गति पकड़ रहा है, यह आदित्यदेव का ही नहीं अरूणिमा का भाग्य रथ भी है। ’’
मुझे पता नहीं क्या सूझा और मैंने ऐसे ही अनर्गल हास्य करते हुए कहा … ‘‘और ये रथ शांम को आदित्यदेव के अस्त होने के साथ ही ….।
बाबूजी ने मेरी बात काटते हुए कहीं बहुत ऊंचे षिखर पर बैठे हुए तत्ववेता की तरह कहा … ‘‘नहीं अरूणिमा, सूर्य कभी भी अस्त नहीं होता, सूर्य तो नित्य निरंतर उदय होता रहता है। पृथ्वी के इस भाग में सूर्य का अस्त होते हुए दिखना केवल हमारे क्षितिज की लघुता और संकीर्णता है। हमारे क्षितिज के इस छोर पर हमारे भाग्य में सूर्य का केवल इतना ही प्रकाष लिखा है जितना हम शांम तक देख पाएंगे और तब सूर्य का रथ क्षितिज के दूसरे छोर पर अपना प्रकाष दे रहा होगा।’’
फिर कुछ सोचते हुए बोले … ‘‘क्या तुम आज स्कूल से अवकाष नहीं ले सकती?’’
मैंने अगले तीन दिन का हिसाब देते हुए कहा … ‘‘नहीं बाबूजी, अभी दषहरा अवकाष के बाद बच्चों का कार्य मूल्यांकन चल रहा है जिसे आज पूरा करना आवष्यक है क्योंकि, कल 13 अक्टूबर शुक्रवार को ईद का अवकाष हो जाएगा। फिर 14 अक्टूबर शनिवार को माधव भैय्या ने शरद पूर्णिमा के चंद्रदर्षन के लिये मसूरी बुलाया है तो एक दिन का अवकाष पहले ही ले लिया है और उसके बाद 15 अक्टूबर को रविवार का अवकाष हो जाएगा।’’
बाबूजी ने मित्रता मिश्रित कृत्रिम निराषा के भाव से कहा … ‘‘ओहो, अर्थात तीन दिन का कार्यक्रम मसूरी में निष्चित कर दिया?’’
मेरे मुंह से एकदम निकल गया … ‘‘बाबूजी वो अगले सोमवार से …।’’
अंजली भाभी ने मेरा हाथ दबाते हुए चुप रहने का संकेत किया तो मैं चुप हो गयी। मेरे मन में राघव भैय्या के शब्द गूंजते रह गये कि अगले सोमवार से शेखर दीपावली अवकाष पर अपने घर चले जाएंगे। मेरे अचानक मौन हो जाने पर बाबूजी ने संज्ञान लेते हुए पूछा … ‘‘रूक क्यों गयी? कहो ना!! अगले सोमवार से क्या होगा?’’
मेरी जिव्हा को ताला लग चुका था, अंजली भाभी भी पारंपरिक मर्यादित मौन धारण किये रही और तब मां ने बाबूजी को समझाते हुए कहा … ‘‘अगले सोमवार से राघव दस दिन के लिये जंगल ट्रेनिंग में चला जाएगा और उसके बाद दीपावली की ड्यूटी में व्यस्त रहेगा तो …।’’
बाबूजी ने आष्वस्त हो कर अंजली भाभी को संबोधित करते हुए प्यार से देखते हुए कहा … ‘‘अरे इसमें शर्माने की क्या बात है अंजली बेटा, हम अनुषासित संगठनों के सदस्यों का यही तो फ़लसफ़ा है कि हम एक-एक पल को जीते हैं। ये तो अच्छा है कि माधव वहां वन अधिकारी है इसी बहाने अरूणिमा भी मसूरी के जंगल, पहाड़, झरनों को समीप से देख सकेगी।’’
मेरी सांस में सांस आई और मैंने पूर्वी क्षितिज पर ऊंचे हो रहे सूरज की ओर देख कर उनके रथ की तेज हो रही गति से मेरे धड़कते हृदय और धमनियों में दौड़ रहे रक्त से तुलना कर रही थी। हिमालय की पर्वत श्रंखला मसूरी से आ रही हवाओं में देहरादून के षिवालयों की घंटियां मेरे कानों में हो रही सांय-सांय को लीलने लगी तब बाबूजी के शब्दों से मेरी चेतना लौटी। मैंने स्वयं को संयत करने का प्रयास कर ही रही थी कि बाबूजी ने बहुत नम्र और आग्रहपूर्ण स्वर में पूछा … ‘‘लेकिन अरूणिमा, क्या तुम आज जल्दी आ सकोगी?’’
मेरे शब्द कहीं अटक गये थे और बहुत मुष्किल से मैंने कहा … ‘‘हं, हां, हां-हां बाबूजी, मैं जल्दी आ जाऊंगी।’’
स्कूल जाने के लिये तैयार होने का समय निकल चुका था। मैं जल्दी-जल्दी तैयार होने लगी, अंजली भाभी रसोई में मेरा टिफिन तैयार करने चली गयी। मां और बाबूजी भी थोड़ी देर बैठे बतियाते रहे और फिर बाबूजी विश्राम करने चले गये। मैं तैयार हो कर ड्राईंग रूम में आई तो मां अंजली भाभी से कुछ कह रही थी जिसे मैं नहीं सुन पाई। मुझे जाने के लिये तैयार देख कर मां मेरा टिफिन तैयार करने के लिये रसोई में चली गयी। मैंने अंजली भाभी की तरफ प्रष्न भरी दृष्टि से देखा तो अंजली भाभी ने मेरे पास आ कर मेरे कांधे पर सांत्वना भरा हाथ रखते हुए कहा … ‘‘कुछ नहीं अरूणिमा, भाग्य का रथ गति पकड़ रहा है। तुम बस जल्दी आ जाना, आज …।’’
अंजली भाभी अपनी बात पूरी कर पाती उससे पहले ही मां आ गयी और मैं अपना टिफिन ले कर बहुत से प्रष्न मन में लिये स्कूल चली गयी।
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स्कूल में मेरा किसी तरह भी मन नहीं लग रहा था। मीना ने मेरे व्याकुल मन को टटोलना चाहा तो मैंने उसे बाबूजी के आने और स्कूल आते समय अंजली भाभी की भाव भंगिमा का सारा कच्चा चिट्ठा बताया लेकिन वह भी कुछ अनुमान नहीं लगा सकी। रह-रह कर शेखर के अगले सोमवार को चले जाने का विचार मेरे मन में अंगारों की तरह चटख रहा था और अंजली भाभी का अब तक राघव भैय्या और मां से बात नहीं कर पाना उन अंगारों को हवा दे रहा था। दूसरी तरफ कल ईद पर मसूरी जाने और तीन दिन तक शेखर के समीप रहने के स्वप्न बर्फीले पहाड़ों में तीर सी ठण्ड़ी हवाओं में गुनगुनी धूप के मरहमी दिलासों का अहसास दिला रहे थे।
ऐसे ही अपने आप में दहकती-सुलगती धुआं-धुआं होती हुई मैं टेबल पर सर रख कर सो गयी। शेखर के मिश्री के पहाड़ों और दूध की झील का स्वप्न मेरा स्वप्न बन गया था। उस दिन सहस्त्रधारा में शेखर की कविता पूरी नहीं हो पाई थी। कविता में वर्णित शेखर के स्वप्न का अंतिम दृष्य ‘‘तभी झोली में मौक्तिक क्षुधा की राख लिये, एक कलकंठ हंस आ गया याचक बन कर’’ आते ही डॉली के पानी में गिर जाने की घटना से कविता का प्रवाह रूक गया था।
आज भी मैं स्वप्न में उस पड़ाव पर पहुंची तो मीना ने झकझोर कर जगाते हुए कहा … ‘‘उठो अरूणिमा, सपनों के रथ पर सवार किस के भाग्य पथ पर अग्रसर हो?
मैंने अलसाते हुए हाथ ऊंचे किये और अंगडाई ले कर कहा … ‘‘मैं भाग्य के रथ पे सवार उस पथ की पथिक हूं जिसका लक्ष्य निष्चित नहीं है।’’
मीना ने मुझे छेड़ते हुए कहा …‘‘हाए-हाए मेरी लाड़ो, ऐसे धधकती हुई लपटों की ज्वाला जैसी अंगडाईयां लोगी तो तुम स्वयं कितने ही पतंगों का लक्ष्य बन जाओगी। अब उठो, अपने-अपने रथों पे सवार हो कर घर के पथ पर चलें।’’
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नागेन्द्र कॉलॉनी के मोड़ पर मीना से अलग हो कर मैं सिद्धेष्वर महादेव मंदिर से थोडी ही दूर रह गयी थी। सिद्धेष्वर महादेव मंदिर को ले कर मेरे अचेतन मन में एक भय व्याप्त हो गया था और मंदिर का षिखर दिखते ही मुझे लगता था कि कोई अदृष्य पाष में बांध कर मुझे खींच रहा है लेकिन दूसरा रास्ता बहुत लंबा होने से इसी मार्ग से जाना मेरी विवषता थी। इस भय से बचने के लिये मैंने आते-जाते समय सिद्धेष्वर मंदिर की ओर नहीं देखने का मार्ग ढूंढ लिया था। बचाव का यही तरीका अपनाते हुए मैं मंदिर के मुख्य द्वार की तरफ नहीं देखते हुए तेजी से निकल जाना चाह रही थी कि तभी मुख्य द्वार से निकलते हुए लोगों की अरे अरे अरे रोको रोको रोको की आवाज़े आई तो मैंने पूरे जोर से ब्रेक लगाये। मैं श्यामा से टकराते-टकराते बची जो भागीरथ के साथ अपनी गाडी की तरफ जा रही थी। मैं स्तब्ध हो कर गिर गई, लोग क्रोध से मुझे भला-बुरा कहते हुए आगे बढने लगे तो भागीरथ ने मुझे संभाला और श्यामा के साथ उनके मां व बाबूजी ने लोगों से कहा कि उन्हें कुछ नहीं हुआ है और मैं उनकी रिष्तेदार ही हूं।
लोग न मालूम क्या-क्या कहते हुए चले गये तो भागीरथ के मां-बाबूजी ने मुझसे कहा … ‘‘तुम ठीक तो हो अरूणिमा? चोट तो नहीं लगी?’’
घबराहट और डर से मैं कुछ नहीं कह सकी। तब श्यामा ने कहा … ‘‘इस हालत में तुम्हारा मोपेड़ चलाना ठीक नहीं है। हम तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ देंगे। तुम हमारे साथ गाडी में आओ और भागीरथ तुम्हारी मोपेड़ से आ जाएगा। वैसे भी हमें उसी तरफ जाना था।’’
उस स्थिति में मुझे यही उचित लगा। गाडी चलाते हुए श्यामा ने कहा … ‘‘देखा तुमने अरूणिमा, संयोग से हुआ वो एक छोटा सा परिचय कितनी जल्दी आत्मीयता में बदल गया है। लेकिन तुम इतनी तेज और हडबडी में गाडी क्यों चला रही थी?’’
मैंने स्वयं को संयत करते हुए कहा … ‘‘बाबूजी आज सुबह ही ड्यूटी से लौट कर आए थे। आवष्यक नहीं होता तो आज मैं स्कूल ही नहीं जाती, मुझे जल्दी आने के लिये कहा था और मुझे स्कूल से निकलने में ही देरी हो गयी।’’
गाडी चलाते हुए श्यामा सहित उसके मां-बाबूजी मेरे और मेरी रूचियों के बारे में पूछते रही। मैंने इसे केवल औपचारिक बातचीत और समय व्यतीत करने का तरीका ही समझा। हालांकि दषहरे के दिन मुझे और अंजली भाभी को छोडने आते समय श्यामा साथ थी, मैं इस सोच के साथ संकेत से घर का रास्ता बताती रही कि श्यामा को रास्ता याद नहीं होगा लेकिन, श्यामा ने एक बार भी रास्ता नहीं पूछा और मेरे बताने से पहले श्यामा हमारे घर के रास्ते की ओर घूम जाती। थोड़ा सा आष्चर्य हुआ जब हमारे पीछे-पीछे ही मेरी मोपेड़ ले कर आ रहे भागीरथ और श्यामा ने गाडी ठीक हमारे घर के सामने रोकी लेकिन मैंने समझा कि बाबूजी के नाम हरेन्द्रसिंह परसारा की पट्टिका देख कर रूके होंगे।
गाडी से उतरते हुए मैंने श्यामा से बिल्कुल औपचारिकतावष कहा … ‘‘आज यहां तक आ ही गये हैं तो आईये ना, चाय पी कर ही जाना और इसी बहाने आप के मां-बाबूज भी बाबूजी से भी मिल लेंगे।’’
मैं श्यामा और उसके मां-बाबूजी के चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान को समझ पाती उससे पहले ही भागीरथ ने मोपेड़ खडी करते हुए कहा … ‘‘लो कर लो बात, उस दिन तो मीना और आप खाना खिलाने की बात कर रहे थे आज केवल चाय में निपटा देंगे फिर कल तो बस पानी से ही काम चलाना होगा।’’
मैं भागीरथ के उलाहने का उत्तर देती उससे पहले ही मां, बाबूजी और अंजली भाभी बाहर आये और श्यामा व भागीरथ का स्वागत करते हुए बोले … ‘‘आईये आईये बुटोला साहब, भाभीजी, श्यामाजी, भागीरथजी आईये। स्वागत है आप का, आईये।’’
एक क्षण के लिये मैं चौंकी और अगले ही क्षण कुछ समझते हुए मैंने अंजली भाभी की ओर देखा। भाभी के संकेत से रहा-सहा संषय भी दूर हो गया। भागीरथ ने गाडी में से कुछ सामान निकाला और आ कर मां और बाबूजी के पांव छुए तो बाबूजी ने आषीर्वाद देते हुए भागीरथ के कंधे पर हाथ रखा और उनके बाबूजी को हाथ जोड़कर नमस्कार करते हुए अंदर ले जाने लगे। मां और अंजली भाभी भी हंसते-बोलते श्यामा व उसकी मां को अंदर ले गयी। मैं मन-मस्तिष्क में कितने ही विचारों की आंधी से धकियाई सी मेरे कमरे में जा कर बिस्तर पर गिर गई। मेरी आंखों में धू-धू करते जल रहे रावण की लपटों की आंच से पिघलते हुए मिश्री के पहाडों से शेखर के साथ बुने हुए दूध के झरनों के सपने आंसू बन कर बह निकले। झील में खिले हुए कंवल मेरे कांपते-थरथराते होठों की तरह डर से सहमे हुए अपने आप में भिंचने लगे और बांसुरी व वीणा की झंकार मेरी सिसकियों में बदलने लगी। तभी अंजली भाभी ने आ कर एक हाथ मेरे मुंह पर और दूसरे से अपनी तर्जनी अंगुली से चुप रहने के संकेत से मुझे चुप कराया। हृदय में उठ रहे दर्द का कोहराम गले में घुट कर रह गया।
भाभी ने मुझे सांत्वना देते हुए कहा … ‘‘अभी कुछ नहीं बिगडा है अरूणिमा!! ये तो रष्मि भाभी के मामाजी तीरथसिंह बुटोला का बेटा भागीरथ और उनकी बेटी श्यामा है। रिष्ते-नातों की बातें बहुत होती हैं लेकिन चुनाव का निर्णय तो बाबूजी ने तुम्हें दे ही रखा है। फिर क्यों …।
तभी मां ने श्यामा और श्यामा की मां के साथ कमरे में प्रवेष करते हुए कहा … ‘‘अरे अरूणिमा, अंजली, तुम ने बताया नहीं कि तुम भागीरथ और श्यामा से मिल चुके हो। चलो अच्छा हुआ, एक दूसरे को देखने-दिखाने रस्म पूरी हो गयी। सब योग-संयोग की बात है।’’
श्यामा ने मेरे पास बैठ कर हंसते हुए अपनी मां से कहा … ‘‘लो देखो, तीन दिन से हम एक दूसरे से मिल रहे हैं तब कुछ नहीं, आज पता लग गया तो शरमा रही है।’’
फिर मुझे संबोधित करते हुए कहा … ‘‘देखा अरूणिमा, संयोगों के संकेत तो अच्छे-अच्छे योगी भी नहीं जान पाते। दषहरे के दिन संयोग से हुई मुलाक़ात के आरंभ में ही हमने जान लिया था कि भागीरथ के लिये जहां रिष्ता करने जा रहे हैं वो तुम हो। इसीलिये तुम्हें उस दिन बाहर ही छोड कर चले गये और कल स्कूल में जितना जान सके उससे कहीं ज़्यादा सिद्धेष्वर मंदिर में …
श्यामा की मां ने बीच में टोकते हुए कहा … ‘‘श्यामा तुम अरूणिमा और अंजली से बातें करो, हम उधर … ।’’
श्यामा ने मां को टोकते हुए मेरे मन की बात कही … ‘‘मां, बातें तो खाना खाते हुए भी हो जाएगी। अरूणिमा स्कूल से दिन भर की थकी हुई आई है, इसे थोड़ा आराम करने देते हैं। तब तक रसोई में मैं अंजली भाभी के साथ हाथ बंटा लेती हूं।’’
अंजली भाभी ने मेरी दुविधा दूर करते हुए कहा … ‘‘खाना तो लगभग तैयार ही है बस हमारी अरूणिमा के हाथों का स्वाद आना बाकी है। हां, हम छत पर बैठने की तैयारी कर लेते हैं।’’
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द्वादषी का चॅंद्रमा पूर्वी क्षितिज पर उदयमान था। छत पर कुछ ही दिन पहले की गयी सजावट मेरे लिये बासी हो चुकी थी लेकिन श्यामा और भागीरथ उस सज्जाषिल्प में खोए हुए थे। गमलों में गुलाब, ज़ेनिया, डहेलिया, गुलदाउदी, जटरोफा, गेंदा, रजनीगंधा के फूल और डफन बेसिया, बॉटल पाम, चाहना पाम व एरिका पाम व अन्य रंगीन पत्तियों के पौधे व एक कोने में एक छोटे होद में मछलियों सहित टेराकोटा का बना हुए फव्वारा, बांस की टोकरियों को पुरानी चुन्नियों से लैम्प का रूप दे कर उनमें दीपावली की छोटी जलबुझ बत्तियां और पडौस की दीवार पर हरे बांसों से पहाडी अंचलों में बनने वाली अर्द्धबौद्ध स्तूूप जैसी झौंपडी में मसनद लगा कर बनायी हुई बैठक में मां और बाबूजी के आराध्य सदाषिव सिद्धेष्वर षिव की ध्यानस्थ प्रतिमा एक शांत व गरिमापूर्ण वातावरण निर्मित कर रही थी। झौंपडी पर मधुमालती के पुष्पों से आच्छादित बेल में लाइटिंग से बहुत आकर्षक प्रभाव उत्पन्न कर रहा था। झौंपडी के सामने टेबल कुर्सी पर बिछे हुए मेजपोष और उन पर रखी भोजन सामग्री जंगली कडकनाथ का भुना हुआ गोष्त, मंडवे की रोटी, चैसोणी, कंडाली का साग, गहत की दाल और झंगूरे की खीर और भांग की चटनी की मिलीजुली सुगंध नथुनों में जा कर क्षुधाग्नि को प्रदीप्त कर रही थी। फलों में बेडू, तिमला, मेलू, काफल, अमेस, दाड़िम, खुबानी, हिंसर, तूंग, खड़ीक, भीमल, आमड़ा, कीमू, भमोरा, भिनु, किनगोड़ और खैणु के ज्यूस की मैंने और अंजली भाभी ने विषेष रूप से कुकिंग क्लासेज में सीखे हुए तरीकों से सजावट की थी।
वॉकमेन के जुगाड़ से बने हुए अदृष्य म्यूज़िक सिस्टम में एस. हजारासिंह की गिटार पर वातावरण के अनुरूप ‘अजीब दास्तां है ये, कहां शुरू कहां खतम’ की धुन के साथ टेबल पर बोन चाइना की तष्तरियों में खाना परोसने से होने वाली चम्मचों की आवाज़ ताल मिला रही थी। टेबल के एक तरफ मैं अंजली भाभी, हमारे बाईं तरफ मां और बाबूजी, सामने भागीरथ के मां-बाबूजी और दाहिनी तरफर भागीरथ व श्यामा बैठे थे। मेरा सारा ध्यान सामाजिक रूप से अतीथि सम्मान की परंपरा, मां-बाबूजी सहित पारीवारिक प्रतिष्ठा अनुरूप संस्कारिक व्यवहार पर केन्द्रित था। थोडी देर पहले तक घर की प्रत्येक वस्तु पर लगने वाला अपनापन एक झिझक में बदलने लगा था और मैं अपने ही घर में शर्म ओढे हुए संकोच की गुडिया बनी हुई थी।
मेरी सकुचाहट व मौन से उत्पन्न संवादहीनता को तोड़ते हुए भागीरथ की मां ने बात शुरू करते हुए कहा … ‘‘छोटी सी छत को अपनी सृजनषीलता से इतना सुंदर सजाया है, ऐसा लगता है जैसे किसी कल्पना को साकार कर दिया है लेकिन अरूणिमा का मौन षिकायत कर रहा है कि कल्पनाओं के लिये ये केनवास छोटा रह गया है।’’
श्यामा ने समर्थन करते हुए कहा … ‘‘हां मां, लेकिन ये छोटा सा केनवास अरूणिमा के मन दर्पण में कल्पनाओं के विषाल आकाष को समेटे हुए है।’’
भागीरथ के बाबूजी बोले … ‘‘तुमने मेरे मुंह की बात छीन ली श्यामा!! लेकिन काष, कि दर्पण बोल सकता तो हम जान पाते कि और कितने आयाम उस में सिमटे हैं?’’
भागीरथ के बाबूजी का सीधा आव्हान सुन कर मुझे कुछ नहीं सूझा और अतंर्मन में कहीं दबे हुए शेखर के शब्द ही स्वर बन कर निकल पडे … ‘‘सभी कल्पनाओं के भाग्य में साकार होने का सामर्थ्य नहीं होता। शरद पूर्णिमा की चांदनी रात, मिश्री के पहाडों में दूघ के झरने और झील में सफेद कंवलों में मोती चुगते हुए हंसों को केनवास पर उतारते हुए मेरे हाथ केवल कोरे काग़ज़ की रिक्तता ही लगी। क्योंकि कल्पनाओं के आकाष का कोई छोर नहीं, इतनी लंबी डोर नहीं, जिसके रथ पर सवार हो कर कोई पतंग आकाष को नाप सके।’’
भागीरथ के बाबूजी का निवाला लिये हुए हाथ मुंह तक जाने से रह गया और उन्होंने मेरी तरफ देखते हुए कहा … ‘‘कितना बड़ा सत्य कह दिया तुमने अरूणिमा!! लेकिन आषा-निराषा के झूले में झूलता हुआ कभी दुख कभी सुख की धूप-छांव के भ्रम में आना जाना ही जीवन है और इस झूलने के आनंद में निमग्न व भ्रमित हम जानते ही नहीं कि हम क्यों झूल रहे हैं?’’
फिर बाबूजी की तरफ मुंह कर उनका समर्थन चाहने की आषा में बोले … ‘‘क्यों परसारा साहब, सही कह रहा हूं ना मैं?’’
अब बाबूजी की बारी थी। म्यूज़िक सिस्टम पर एस. हजारासिंह की गिटार पर ‘जिंदगी कैसी है पहेली हाए’’ की धुन बज रही थी। बाबूजी ने पानी का एक घूंट ले कर कहा … ‘‘जीवन को परिभाषित करने का प्रपंच अनादि काल से चला आ रहा है लेकिन आज तक कोई एक परिभाषा पर सहमति नहीं बन सकी क्योंकि सभी की परिभाषा अपने-अपने वातावरण और दृष्टिकोण विषेष पर निर्भर रही है। किसी ने ज़िंदगी को अजीब दास्तां कहा तो किसी ने पहेली लिख दिया। अरूणिमा के लिये जीवन आज अनंत आकाष का केनवास है और हमारे लिये आषा-निराषा में झूलती दुख-सुख की धूप-छांव। अब देखिये ना कल रष्मि आपकी भान्जी थी तो आप बेटी वाले थे, आज भागीरथ आप का बेटा है तो हम बेटी वाले हो गये।‘’
भागीरथ के बाबूजी थोडा असहज हुए किंतु तुरंत ही बात संभालते हुए कहा … ‘‘ये तो योग-संयोग की बात है परसारा साहब। कल्पना कीजिये कि अरूणिमा माधव से बडी होती तो ये स्थिति वर्तमान के उलट होती। लेकिन आप से विनती है कि एक बार हमारा घर, परिवार व वातावरण अवष्य देखिये जिससे आप आष्वस्त हो सकें कि जितना सुख, सुविधा अरूणिमा बिटिया को यहां आपने दिया है उसका आधा भी हम दे पाएंगे या नहीं? और एक बहुत स्पष्ट बात है, कि हमने जिस प्रकार अंतिम निर्णय रष्मि पर छोड़ा था उसी प्रकार यह निर्णय बेटी अरूणिमा का होगा। काष, माधव और रष्मि भी यहां होते!!’’
बाबूजी ने बताते हुए कहा … ‘‘मुझे भी आज ही वैष्णोदेवी मेला ड्यूटी से लौटने पर पता लगा कि उसका स्थानांतरण मसूरी हो गया है। अब नया-नया पदस्थापन …’’
भागीरथ के बाबूजी ने बात काट कर एक लंबी हां करते हुए कहा … ‘‘हां… ये तो नौकरीपेषा लोगों की विवषता ही है। अब देखो ना, ऋषिकेष से श्यामा के साथ किषोर को भी आना था लेकिन …। उत्तरदायित्व और परिस्थितियों के आगे हम सब विवष हैं।’’
मां ने बाबूजी की अर्द्धांगिनी का कर्तव्य निभाते हुए बात को आगे बढ़ाते हुए भागीरथ के मन को पढ़ने का प्रयास करने की चेष्टा करते हुए उन्हें इंगित कर के कहा … ‘‘हमने तो परिस्थितियों के अनुरूप्प ज़िंदगी को जिस दृष्टिकोण से देखा कह दिया। लेकिन वो अतीत की बात हो गयी। महत्वपूर्ण यह है कि आज की पीढ़ी का ज़िंदगी के प्रति क्या दृष्टिकोण है?’’
भागीरथ ने गहत की दाल में लिपटा मंडवे की रोटी का निवाला चबाते हुए चम्मच से झंगूरे की खीर मुंह में रखी और संकेत ही संकेत में मेरी कही बात का उत्तर देते हुए कहा … ‘‘मैं एक मध्यममार्गी हूं, चाहे आप समन्वयवादी कह लें। मेरा मध्यममार्ग यह है कि अपनी कल्पना के केनवास पर रंगों का आकाष न उतार सको तो केनवास के काग़ज़ को पतंग बना कर उमंग के तंग डालो और मुस्कान का मंाझा लगा कर मौसम के अनुकूल रहने तक उड़ो। पृकृति ने सभी सातों रंगों को सूर्य के प्रकाष में मिला कर स्फटिक श्वेत कर दिया अब ये तो देखने वाले की दृष्टि और उपाय पर निर्भर करता है कि वो अपनी प्रज्ञा के प्रिज़्म से इस स्फटिक श्वेत रंग में इन्द्रधनुषी सप्तरंगों को देख सके।’’
म्यूज़िक सिस्टम पर ‘ज़िंदगी एक सफ़र है सुहाना की धुन बजने लगी थी। खीर का एक और चम्मच मुंह में डालते हुए भागीरथ ने कहना जारी रखा … ‘‘जीवन की कोई परिभाषा अतीत के कोष में संचित नहीं वरन् देष, काल और परिस्थिति के अनुरूप सदैव वर्तमान है। एक ही समय में एक ही स्थान पर परिस्थिति भिन्न होने से कोई इसे अजीब दास्तां कहता है तो कोई सुख-दुख की छांव में आता जाता आषा-निराषा का झूला। कोई ज़िंदगी को दुखों का सागर कहता है तो कोई सुहानी यात्रा जिसमें अगले पल क्या होगा? तो जीवन वास्तविकता है या भ्रम? ये कोई नहीं जानता।’’
भागीरथ ने दृष्टि घुमा कर सब के चेहरे पढ़ने का प्रयास किया। सभी भागीरथ के सम्मोहन वृत्त में आवृत थे और मेरे अंदर कहीं समाधी लगाये शेखर का अक्स भागीरथ में साकार होने लगा था। भागीरथ ने अपना प्रवचन जारी रखते हुए कहा … ‘‘अब मैं जीवन को वास्तविकता और भ्रम में समन्वय के दृष्टिकोण से देखता हूं तो मेरा व्यक्तिगत विचार है कि हर मनुष्य का जीवन एक किताब है। इस किताब में उम्र का समय विषेष एक विषय है जिसका प्रत्येक वर्ष एक अध्याय है। जीवन की इस किताब में प्रत्येक वर्ष के अध्याय में ऋतुओं के चार पृष्ठ है जिनमें एक-एक महीने के तीन अंतरों में चार हफ़्तों रूपी सात-सात दिनों की पंक्तियों में दिन वाक्य तथा प्रत्येक वाक्य में हर प्रहर एक शब्द और एक-एक लम्हा अक्षर हैं।’’
‘‘लेखकीय दृष्टिकोण से यह किताब या तो ईष्वर ने लिखी है अथवा मनुष्य स्वयं अपने जीवन की किताब लिख रहा है। दोनों ही अवस्थाओं में मानव की विवषता यह है कि यदि इसे ईष्वर द्वारा लिखित माना जावे तो अपने जीवन की इस किताब में अगले एक अक्षर का भी अनुमान नहीं लगा सकता। इसी प्रकार यदि यह किताब मनुष्य स्वयं लिख रहा है तो जीवन के चार हिस्सों में पूरी होने वाली इस किताब के बारे में वह नहीं जानता कि अगले ही पल वह क्या लिखेगा। दोनों ही अवस्थाओं में ना तो हम यह बता सकते कि अगले पल में हम क्या पढेंगे और ना ही यह कि हम क्या लिखेंगे? हमारे अधिकार में तो यह भी नहीं कि जो हम ने पढ़ लिया उसे भूल जाएं या जो हम ने लिख दिया उसे मिटा कर संषोधित कर दें।’’
’’कुछ भी हो, यह किताब बहुत विलक्षण है। कभी तो एक अक्षर ही पूरी किताब है और कभी पूरी किताब एक अक्षर में सिमट जाती है। एक ही अक्षर हमें हंसा देता है, एक ही अक्षर हमें रूला देता है और कहीं भी यह महसूस नहीं होता कि ये अक्षर ठीक से जमे हुए नहीं हैं। मनुष्य अपने जीवन की किताब का कोई भी अक्षर या शब्द नहीं भूलता लेकिन पूरी किताब पढ़ने के बाद भी यह मनुष्य को समझ में आना तो दूर इसके एक शब्द को दोहरा सकना भी उसके लिये असंभव है।’’
‘‘निष्चित रूप से यही कारण है कि मृत्यु के आवरण से ढंकी हुई जीवन की इस किताब को सदा सर्वदा के लिये स्मृतियों का कफ़न ओढ़ा कर समय की अर्थी में विदा की जा कर विछोह की क़ब्र या चिता में अंत्येष्ठी कर दी जाती है। बहुत कम किताबें ऐसी हैं जिनकी स्मृतियों का कफ़न हमारे जीवन पथ को छाया से भरता है लेकिन इतिहास साक्षी है कि स्मृतियों के कफ़न की छाया ….।’’
मेरे अंतर्मन में समाधिस्थ शेखर ने जैसे आंखें खोली हो और उनके शब्द मेरे कानों में गूंजने लगे, ‘‘तुम्हारे निष्छल प्रेम की ये स्मृति अखंड ज्योति बन कर हमेंषा मेरे हृदय में प्रज्वलित रहेगी। हम कहीं भी हों, कल जब ये समय अतीत बन जायेगा तब मन के आंगन में तुम्हारे सामीप्य की सुखमयी यादों का दीपक जलाकर जीवन के अन्जान अनिष्चित अन्धेरे पथ पर चलता रहूंगा। इस दीपक में तुम्हारे विष्वास का तेल, श्रद्धा की बाती, आस्था की लौ और तुम्हारे प्रेम का उजियारा होगा। विष्वास टूटेगा नहीं, श्रद्धा मिटेगी नहीं, आस्था समाप्त नहीं होगी और हमारा ये प्रेम मंदाकिनी की कलकल में अमर रहेगा।’’ और मैंने भागीरथ की बात काटते हुए कहा …. ‘‘लेकिन मन के आंगन में जल रहा सुखमयी स्मृतियों का दीपक तो जीवन के अंधेरे पथ को प्रषस्त कर सकता है ना?’’
सब अवाक् मेरी तरफ देख और संभवतः मैंने जो कहा उसे समझने का प्रयास कर रहे थे लेकिन अंजली भाभी के अतिरिक्त कोई नहीं समझ पाया। पृष्ठभूमि में गिटार पर ‘याद न जाए, बीते दिनों की, जा के ना आए जो दिन, दिल क्यों बुलाए’ की धुन आ रही थी।
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