मंदाकिनी पार्ट 19 / Mandakini part 19

एक महीने से मंदाकिनी रूकी पड़ी है। लेकिन क्या ऐसा हो सकता है? दर असल मैं चाहता था कि मसूरी एपिसोड़ को एक बार में निपेट दूं लेकिन ये मंदाकिनी के साथ अन्याय होता। तो अब तक आप ने पढ़ा कि दशहरे के बाद मंदाकिनी और भागीरथ के विवाह की बातें आगे बढने लगी थी और इसी सिलसिले में भागीरथ का परिवार बडे नाटकीय तरीके से मंदाकिनी के घर आया।
अब आगे …
उनके जाने के बाद मैं मां और बाबूजी से रूठी रही और वे बहुत देर तक मुझे समझाते और विष्वास दिलते रहे कि अंतिम निर्णय मेरा ही रहेगा। बाबूजी ने बहुत दुलारते हुए मेरे मन में कोई और होने बाबत पूछा भी तो मैं शेखर से अब तक कोई स्पष्ट स्वीकारोक्ति नहीं मिलने के कारण कोई उत्तर न दे सकी। मां-बाबूजी के सामने तो अंजली भाभी को कुछ नहीं कहा लेकिन रात को उन्हें भी मुझे निराष करने का उलाहना दिया तो अंजली भाभी ने अगले तीन दिन के मसूरी प्रवास के दौरान शेखर से बात करने के बाद राघव भैया और माधव भाई साहब से बात करने का वचन दिया।
अंजली भाभी सो चुकी थी लेकिन मेरे लिये वो रात बहुत बेचैनी भरी रात थी। शेखर से भद्रपूर्णिमा गुरूवार 14 सितंबर को पहली बार मिलने से लेकर 14 अक्टूबर को आने वाली शरद पूर्णिमा से एक दिन पूर्व के एक माह तक का समयचक्र मेरी आंखों में चलचित्र की भांती घूम रहा था। नियुक्ति के पहले ही दिन मेरी साइकिल की चेन का उतरना, राघव भैय्या के साथ उनका घर आना, सिद्धेष्वर महादेव मंदिर में मेरे और उनके कलावे का एक साथ बंध जाना, सहस्त्रधारा में उनके साथ होने का पहला अहसास और उनका मुझे मंदाकिनी उपमा से बुलाना, टपकेष्वर महादेव में उनका ‘‘मैं ये कर ना सकूंगा मैं ये कह ना सका’’ गीत और रॉबर्स केव में शेखर का वो कथन कि ‘‘मेरे लिये तो दोनों ही निर्दोष और पवित्र हैं। दोनों ही स्त्री है, अंतर केवल इतना है कि अरूणिमा सुबह सुबह की उषा है जो थोडी देर बाद तपते हुए सूरज की तरह जलने लगती है किंतु मंदाकिनी सदा सर्वदा एक जैसी रहती है। समय का उस पर कोई प्रभाव नहीं पडता। निर्णय तुम्हें करना है कि तुम अरूणिमा की तरह लुप्त हो कर तपती दुपहरी में बंजारन की तरह किसी वृक्ष के नीचे फिर सुबह होने के समय की प्रतीक्षा करोगी या मंदाकिनी की तरह समय के साथ और समय के पार कलकल निनाद करती शेखर के हृदय में गूंजती रहोगी?’’ और मेरे उस समर्पण को हमारे प्रेम का कलंक होने से बचाते हुए उनके कहे हुए शब्द ‘‘उठो अरूणिमा, आज का ये समय याद रखना। देखो षिवालय से आ रहे शंखनाद इस क्षण के साक्षी हैं कि तुम्हारे दिये हुए इस सिंदूरी दुषाले का रंग देहरादून के पूर्वी क्षितिज पर अरूणिमा बन कर मेरा मार्ग प्रषस्त कर रहा है। तुम्हारे इन निष्छल शब्दों ने मेरे मन और मस्तिष्क में तुम्हें हमेंषा-हमेंषा के लिये स्थापित कर दिया है। इस समय मैं तुम्हें केवल इतना कह सकता हूं कि तुम्हारे निष्छल प्रेम की ये स्मृति अखंड ज्योति बन कर हमेंषा मेरे हृदय में प्रज्वलित रहेगी। हम कहीं भी हों, कल जब ये समय अतीत बन जायेगा तब मन के आंगन में तुम्हारे सामीप्य की सुखमयी यादों का दीपक जलाकर जीवन के अन्जान अनिष्चित अन्धेरे पथ पर चलता रहूंगा। इस दीपक में तुम्हारे विष्वास का तेल, श्रद्धा की बाती, आस्था की लौ और तुम्हारे प्रेम का उजियारा होगा। विष्वास टूटेगा नहीं, श्रद्धा मिटेगी नहीं, आस्था समाप्त नहीं होगी और हमारा ये प्रेम मंदाकिनी की कलकल में अमर रहेगा।’’ डाट काली मंदिर से लौटते समय वन विभाग के गेस्ट हाउस में उनके कहे शब्द ‘‘सत्य कल्पनाओं से सदा सर्वदा अधिक आष्चर्यजनक, निष्ठुर और कठोर होता है मंदाकिनी। कल्पनाओं के पंखों पे सवार आसमान में आषियाना बनाने के लिये ऊपर बहुत ऊपर तो पहुंच जाते हैं लेकिन जब ये सत्य सामने आता है कि आसमानों में किसी का आषियाना नहीं होता तो …।’’ मेरे कानों में गूंजते रहे और ये कहते हुए शेखर की आंखों में छलक आये आसंू? तो क्या शेखर को हमारे विछोह का पूर्वाभान था? शेखर सत्य और कल्पना का अंतर बताते हुए क्या कहना चाहते थे जो मैं समझ नहीं पायी?
मुझे अपने प्रष्नों का उत्तर नहीं मिल रहा था। पास में सो रही अंजली भाभी के चेहरे पर पसरी हुई शांती और होठों पर छाई मुस्कान कह रही थी कि वो स्वप्न में शायद अपने गर्भस्थ षिषु से बात कर रही थी। अंजली भाभी पर निर्भरता समाप्त करते हुए अपने अंदर चल रहे अंतर्द्वद्व को विराम दे कर मैंने निर्णय कर लिया कि सुबह बाबूजी को मैं स्वयं ही सबकुछ बता दूंगी। नहीं जानती ये मेरे अंदर कहीं सिद्धेष्वर महादेव मंदिर की घंटी की अनुगूंज थी या समय की सूचना देता किसी षिवालय का घंटनाद कि घंटी के मंद होते स्वर के साथ मेरे मन का बोझ तो कम लेकिन भारी होती हुई पलकें मुझे गहरी नींद में डुबो गयी।
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चाय की प्याली के साथ सुबह अंजली भाभी ने मुझे जगाया तो दस बज चुके थे, कारण समझ में आ गया कि वो घंटनाद मेरे अंदर की अनुगूंज नहीं था बल्की मैं सुबह जागने के समय सोई थी। चाय की पहली घूंट के साथ मेरी तन्द्रा टूटी तो मुझे अपना निर्णय याद आया और एक झटके से उठ कर मैंने बाबूजी के बारे में पूछा तो अंजली भाभी ने बताया कि शहर में ईद मीलादउननबी का जुलूस होने से वे सुबह जल्दी ही कानून-व्यवस्था की ड्यूटी में चले गये हैं और मां सिद्धेष्वर मंदिर के पुजारीजी से मेरी और भागीरथ की जन्मपत्री का मिलान करवाने गयी है। मन में उठे हाहाकार से एक क्षण के लिये मैं विचलित हुई लेकिन लिये जा चुके निर्णय की दृढ़ता ने मन के आक्रोष को छलकने नहीं दिया। मेरे चेहरे की भाव भंगिमा को पढ़ व समझ कर अंजली भाभी ने अपना स्पष्टीकरण देना चाहा तो चाय की अंतिम घूंट लेते हुए मैं बहुत उपेक्षापूर्वक … ‘‘रहने दो भाभी, स्वर्ग स्वयं के मरणोपरांत ही मिलता है तो मां-बाबूजी से मैं स्वयं बात कर लूंगी’’ कहते हुए मैं नित्यकर्म से व्यस्त हो गयी।
स्मृतियों की फुहार में नहा कर समय के तौलिये से मस्तिष्क की सारी सीली हुई झिझक को साफ किया और अपने उलझे हुए बालों के साथ मन की सभी दुविधाओं को संवारा तब तक भाभी दोपहर का खाना तैयार कर चुकी थी, मां भी मेरी और भागीरथ की जन्म-पत्रियों के ग्रह-नक्षत्रों के गुण गति को समझ कर आ चुकी थी और खाने की टेबल पर मेरी प्रतीक्षा कर रही थी। सोचते विचारते दृढ़ हो चुके मेरी धमनियों में गर्म हो चुके रक्त और उबलते हुए मन का प्रतिबिंब मेरे चेहरे और आंखों में अपना स्थान बना चुका था तो वहीं मेरी दृढ़ता से उपजी उपेक्षा ने अंजली भाभी में भी संभवतः उत्तरदायित्वपूर्ण जागृति को स्फूर्त कर दिया था। शायद अंजली भाभी ने मां को कोई संकेत कर दिया था जिसका प्रभाव मां के चेहरे पर स्पष्ट था।
नहीं जानती कि मां में एक अनुभवी औरत बोल रही थी या उनकी ममता? लेकिन मां ने बहुत दुलार से मुझे अपने पास दाहिनी ओर बैठाते हुए कहा … ‘‘अरूणिमा, तुम किस के इतना समीप पहुंच गयी कि मां भी तुम्हें दूर लगने लगी?
मां के शब्द तो बहुत साधारण थे लेकिन बर्फ़ की बर्छियों की तरह ठंडा स्वर मेरी धमनियों में उतर कर बह रहे गर्म लहू को ठंड़ा कर गया। मेरी आंखें डबडबाने लगी और मुंह से अस्फुट स्वर मैंने कहना चाहा … ‘‘मां, वो …., मैं शेखर….।’’
मां के चेहरे की भाव भंगिमा ने मेरे अंदर उठ रहे ज्वार को शांत कर दिया। आंसू की बूंदे मोटी हो कर पलकों की कोर से कूद पड़ने को आतुर थी तब मां ने मेरा हाथ पकड़ कर दोनों हाथों से सहलाते हुए कहा … ‘‘मुझे अंजली ने सब बता दिया बेटा!! बल्की मैं कहूं कि मुझे भी शेखर बहुत पसंद है लेकिन …।’’
कितनी ही आषंकाओं की तड़प समेटे लेकिन शब्द एक बिजली की तरह मेरी आषा की उभरती किरण को लील गया। अपने ही भार को सह न सकने वाली आंसू की बूंद सहस्त्रधारा के झरने सी बह निकली और मैंने फफकते हुए कहा … ‘‘लेकिन!! लेकिन क्या मां?’’
मेरे दूसरी ओर बैठी अंजली भाभी ने मेरे कांधे पर हाथ रखा और दूसरे हाथ से मेरे चेहरे को अपनी तरफ करते हुए कहा … ‘‘लेकिन, किंतु और परंतु का हमेंषा वो ही अर्थ नहीं होता अरूणिमा, जिसमें केवल और केवल आषंकाए हों। कभी-कभी इस लेकिन में अपार आषा और संभावनाएं निहित होती हैं।‘‘
अंजली भाभी के शब्दों से मेरा मन कुछ शांत हुआ तो मैंने आषंका और संभावना की पहेली का हल जानने को आतुर हो कर पूछा … ‘‘आप मनोविज्ञानीयों की भाषा साधारण लोगों के लिये समझना कठिन है भाभी!! लेकिन शब्द में आषंका और सभावना? क्या एक मयान में दो तलवारें हो सकती हैं?’’
अंजली भाभी ने हंसते हुए कहा … ‘‘ये तुमने अच्छा उदाहरण दिया, एक मयान में दो तलवारें। वस्तुतः लेकिन एक दुधारी तलवार है जिसके दोनों किनारों की तीक्ष्णता में बहुत सूक्ष्म किंतु वास्तविक अंतर होता है अरूणिमा।’’
मेरे बहते हुए आंसुओं का बहाव जैसे रेत के समंदर में अस्तित्व खोने लगा था। आषंकाओं की आंच से मेरे शुष्क होते होंठों की तरफ अंजली भाभी ने पानी का गिलास बढ़ाते हुए कहना जारी रखा … ‘‘आषंका जहां नकारात्मकता को उद्वेलित करती है वहीं संभावना में सकारात्मकता प्रतिध्वनित होती है।’’
मां और भाभी के शब्द और भाव भंगिमा से मुझे कुछ सकारात्मक आभास होने लगा था। पानी की एक घूंट ने मेरे तपते हुए हृदय को शांत किया तो मैंने भाभी को अपनी डांवाडोल नैया का मांझी मानते हुए कहा … ‘‘भाभी, अषांत जल में कोई प्रतिबिंब नहीं दिखता!! मेरा अषांत मन भी आप की बात का ओर छोर नहीं समझ पा रहा। कुछ सरल और सीधे शब्दों में कहो।’’
अंजली भाभी ने तपाक से निर्णायक स्वर में कहा … ‘‘शेखर की स्वीकारोक्ति ही मां के लेकिन में छिपी आषंका की नकारात्मकता को संभावना की सकारात्मकता में बदल सकती है अरूणिमा!!’’
मैंने आष्चर्य, अविष्वास और प्रष्नवाचक दृष्टि से मां की तरफ देखा तो मां ने उठ कर मुझे दुलारते हुए कहा … ‘‘हां अरूणिमा, माता-पिता की कथनी और करनी में भेद नहीं होता। तुम्हारे बाबूजी ने निर्णय तुम पर छोड़ा है जिसका अर्थ है कि हमें तुम पर पूरा विष्वास है तो तुम्हें भी हम पर विष्वास होना चाहिये।’’
हर्षातिरेक में मां से लिपटते हुए मेरे आंसू मां की ममता के सागर में अपना अस्तित्व खोने लगे। मैंने मां से क्षमा याचना करते हुए कहा … ‘‘मुझे क्षमा कर दो मां, बाबूजी और आपकी महानता का आंकलन करने में मुझ से भूल हुई है।’’
मां ने मुझे थपथपाते हुए कहा … ‘‘कोई बात नहीं अरूणिमा, रोओ मत! लेकिन अब ये निर्णय तुम्हें जल्दी करना होगा क्योंकि तुम्हारी समस्याओं का हल केवल तुम्हारे पास है दूसरों के पास तो केवल सुझाव हैं। इसलिये तुम्हारे बाबूजी को बताने से पहले शेखर और तुम्हारे बीच ये असमंजस के बादल छंट जाने चाहिये। तुम …’’
अंजली भाभी ने मां की बात काटते हुए कहा … ‘‘ये उत्तरदायित्व मेरा है बुआजी। वैसे भी अरूणिमा को दिये हुए वचन का ऋण मुझे चुकाना है।’’
मां ने मेरा हाथ अंजली भाभी के हाथ में देते हुए कहा … ‘‘तो फिर ये उत्तरदायित्व संभालो अंजली। हां, तुम्हारा उत्तर मिलने तक भागीरथ और अरूणिमा की जन्मपत्रियों का ये अध्याय बंद रखने का दायित्व मेरा है।’’
खाना खाते हुए हमारी चर्चा शेखर के अस्तित्व और व्यक्तित्व के वृत में प्रवेष कर उन्हें समझने का प्रयास करती रही। मां अपने अनुभव से शेखर और मेरे बीच हुए संवादों और घटनाओं का बहुत सूक्ष्म आंकलन कर रही थी किंतु हम किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाए। मां की हिदायतों के साथ मैं और अंजली भाभी तीन दिन तक मसूरी प्रवास के लिये अपना सामान ले कर मेरी हीरो मैजेस्टिक मोपेड़ से अपरान्ह लगभग दो बजे हम लायब्रेरी बाज़ार में बस स्टेंड पर पहूंचे तो मसूरी की पहचान के उलट बाज़ार में एक सन्नाटा सा छाया हुआ और लोगों के चेहरे पर तनाव व्याप्त था और पुलिस के जवान तैनात थे। हम कुछ समझ नहीं पाए, हमें तो लायब्रेरी बस स्टेंड से थोडी ही दूर श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर पहुंचना था जहां राघव भैय्या और शेखर हमारा इंतेज़ार कर रहे थे। मैं और अंजली भाभी बस स्टेंड से गुरूद्वारे के सामने यू टर्न ले कर श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर की तरफ जा ही रहे थे कि माल रोड़ की तरफ से शोर सुनाई दिया। हम घबरा कर गुरूद्वारे में घुसे तो एक बुजुर्ग ज्ञानीजी ने ढाढ़स बंधाते हुए हमें शर्बत पीने को दिया और बताया कि पैगंबर मुहम्मद के जन्मदिवस पर मालरोड पर स्थित जामा मस्जिद और गुलजार मस्जिद में मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा नमाज के बाद जुलूस ए मौहम्मदी का आयोजन किया जा रहा था जिसमें ‘ना‘रा ए तकबीर, अल्लाह हो अकबर’, ‘नारे रिसालत, या रसूल अल्लाह’, ‘तालीम उल इस्लाम, जिं़दाबाद-जिं़दाबाद’ के नारे लग रहे थे। मसूरी में पहले ऐसा नहीं होता था लेकिन पिछले दो तीन साल से ये परंपरा शुरू हुई है, जामा मस्जिद के सामने ही लक्ष्मीनारायण मंदिर और पास में ही गुरूद्वारा होने से दोनों समुदायों में टकराव की स्थिति की आषंका के चलते पुलिस बंदोबस्त लगाया जाने लगा है। ये जुलूस जामा मस्जिद से शुरू हो कर पांच किलोमीटर दूर लंडौर स्थित जामा मस्जिद तक जाएगा।
जुलूस के रास्ते में माल रोड़ के दोनों तरफ गुरूद्वारे और श्री लक्ष्मीनारायण मदिरन प्रबंधन की तरफ से शर्बत और पानी की व्यवस्था की गयी थी। तसल्ली होने पर जुलूस निकल जाने तक समय व्यतीत करने के लिये हम भी गुरूद्वारे द्वारा जुलूस वालों के लिये लगायी गयी शर्बत की स्टॉल पर चले गये। जुलूस में बहुत अधिक लोग नहीं थे लेकिन मसूरी के स्थानीय लोगों के अतिरिक्त अन्यत्र स्थानों से आये लोगों को पहचान सकना भी कठिन नहीं था। गुरूद्वारे से दिख रही जामा मस्जिद के लगभग सामने ही श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर पर आते-आते जुलूस में शामिल उन बाहरी लोगों ‘तालीम उल इस्लाम, जिं़दाबाद-जिं़दाबाद’ का नारा लगाते हुए ‘कष्मीर हमारा है, हम ले के रहेंगे आज़ादी’, ‘आजादी का मतलब क्या, ला इलाहा इल्लाह’ ‘दुनिया का मुसलमान, एक है एक है‘ ‘ला इलाहा इलल्लाह, मोहम्मद उर रसूल अल्लाह’ ‘यहां क्या चलेगा, निजाम ए मुस्तफ़ा’ ‘यहां अगर रहना है, अल्लाहो अकबर कहना है’ और ‘असि गछि पाकिस्तान, बटव रोअस त बटनेव सान’ (मतलब ‘हमें पाकिस्तान चाहिए और हिंदू औरतें भी मगर अपने मर्दों के बिना) का नारा लगाने लगे। इस अप्रत्याषित घटना से माल रोड़ के दुकानदारों और मसूरी के स्थानीय लोगों के चेहरों पर चिंता व तनाव की रेखाएं खिंच गयी। जुलूस के साथ चल रही पुलिस फोर्स भी हरकत में आने लगी तो जामा मस्जिद के इमाम और दूसरे समझदार लोगों ने उन शरारती लोगों को धमकाया तो वे का नारा लगाते हुए विरोध करने लगे। पुलिस ने त्वरित कार्यवाही करते हुए उनकी घेराबंदी की तो वे धक्कामुकी करने लगे जिससे जुलूस में शामिल लोग भी कुछ उग्र होने लगे। मामला बढ़ता देख गुरूद्वारे के बुजुर्ग ज्ञानीजी ने हमें और दूसरी महिलाओं को गुरूद्वारे में जाने के लिये कहा।
बाहर से आ रही आवाज़ों से हम केवल स्थिति का अनुमान लगा पा रहे थे। थोडी देर शोर-षराबे के बाद माइक पर किसी बडे पुलिस अधिकारी द्वारा भीड़ को संबोधित कर शांतीपूर्वक जुलूस निकालने और भडकाऊ नारे नहीं लगाने अन्यथा जुलूस की अनुमति रद्द कर दिये जाने के लिये कहा जा रहा था। तभी गुरूद्वारे में किसी ने बताया कि मसूरी के निर्दलीय जनप्रतिनिधि और मात्र 3225 वोटों से हारे हुए राष्ट्रीय कांग्रेस दल के चुनाव प्रत्याषी भी अपने-अपने समर्थकों के साथ आ गये हैं और जुलूस में भडकाऊ नारे लगा रहे उपद्रवियों का पक्ष ले कर उन्हें भटके हुए युवा बताते हुए उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हिमायत और साथ ही मसूरी के स्थानीय दुकानदारों व लोगों को साम्प्रदायिक सद्भाव व सौहार्द्रता तथा मसूरी की गंगा-जमनी परंपरा बनाए रखने की अपील कर रहे हैं। इसी बीच बजरंग दल स्थापना के पांच वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में ‘सेवा, सुरक्षा और संस्कृति पखवाड़ा’ मना रहे कुछ स्थानीय कार्यकर्ता राम-जानकी रथ यात्रा निकाल रहे थे जो जुलूस ए मौहम्मदी के सामने आ गये और उन्होंने भड़काऊ नारे लगा रहे लोगों को तुरंत गिरफ़्तार करने की मांग करते हुए दोनों स्थानीय नेताओं की हाय-हाय के नारे लगाने शुरू कर दिये जिससे दोनों नेताओं के कार्यकर्ता और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं में झड़प हो गयी। पुलिस ने हल्का बल प्रयोग कर तीस-चालीस लोगों को हिरासत में ले कर उन्हें अलग-अलग मसूरी पुलिस स्टेषन और कोतवाली पुलिस स्टेषन ले कर गयी है। पुलिस और प्रषासनिक अधिकारियों ने देहरादून से अतिरिक्त पुलिस बल आने तक आईटीबीपी के वरिष्ठ अधिकारियों से आवष्यकता पड़ने पर सहायता दिये जाने की प्रार्थना की है लेकिन आईटीबीपी के शीर्षस्थ अधिकारियों ने केन्द्रीय पुलिस बल होने के कारण गृह मंत्रालय दिल्ली से अनुमति के बिना अपने अधिकारी कर्मचारियों को सहायता हेतु उपलब्ध करवाने में असमर्थता जताई है। बाहर स्थिति नियंत्रण में किंतु तनावपूर्ण है।
हम असमंजस में थे कि क्या करें क्या न करें? राघव भैय्या और शेखर लगभग सामने ही हमारा श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर में इंतेज़ार कर रहे थे और हम यहां गुरूद्वारे में थे। उहापोह की इसी स्थिति में लगभग दो घंटे बीत गये, हमारी बेचैनी बढ़ती जा रही थी तब बुजुर्ग ज्ञानीजी ने आ कर हमें बताया कि कोई दो युवक हमारी मोपेड़ देख कर हमारे बारे में पूछ रहे हैं तो हम जल्दी से बाहर आये। राघव भैय्या और शेखर को देख कर हमारी जान में जान आयी और हमें सुरक्षित देख कर उनके चिंताग्रस्त चेहरे भी खिल उठे।
बुजुर्ग ज्ञानीजी को धन्यवाद दे कर हम गुरूद्वारे से बाहर आये, भाईचारे का शर्बत नफरत की काली सड़क के दोनों ओर अविष्वास के किनारों पर नालियों में बह चुका था, मातम से निढ़ाल लुढ़के हुए शर्बत के ड्रम व गिलास अपनी असफलता पर लज्जित थे और ढलते हुए सूरज के साथ अधिक युवा हो जाने वाला और हमेंषा किसी नवविवाहिता की तरह उत्साह से भरपूर चहल-पहल भरा बाज़ार किसी विधवा के लुटे हुए श्रंगार के बाद बंद और सूने मालरोड़ पर पुलिस का फ्लेग मार्च जैसे जुलूस ए मौहम्मदी के बाद मसूरी की खूबसूरत पहचान की शवयात्रा निकल रही हो।
फ्लेगमार्च निकल जाने के बाद राघव भैय्या के साथ अंजली भाभी मेरी मोपेड़ पर और मैं शेखर के साथ मोटर साईकिल पर केम्पटी फॉल्स के लिये रवाना हुए जो लायब्रेरी बस स्टेंड से लगभग पन्द्रह किलोमीटर दूर था। मेरे मन बेचैनी से ज़्यादा मां की चेतावनी मुझे जल्दी से जल्दी शेखर से दो टूक बात करने के लिये प्रेरित कर रही थी। आधा पौन किलोमीटर वाल्मीकी मंदिर के बाद अगले दो किलोमीटर लाल बहादुर शास्त्री अकादमी तक हवा में ठण्डक बढ़ने लगी थी और मैं अवसर की तलाष में थी लेकिन राघव भैय्या भी हमारे समानांतर ही चलते हुए शेखर से बात कर रहे थे। लाल बहादुर शास्त्री अकादमी से पीक व्यू मोड तक का अढाई तीन किलोमीटर तक भी यही स्थिती रही और मैं कोई भूमिका नहीं बना पाई। अगले पांच मिनट में हम पीक व्यू मोड़ से होटल फॉरेस्ट इन एंड रेस्टोरेंट पहुंचे तो राघव भैय्या ने रूक कर अंजली भाभी को होटल के दूसरी ओर सामने मसूरी इंटरनेषनल स्कूल, केन्द्रय विद्यालय और उसके पीछे दलाईलामा पहाड़ियों में बुद्ध और काली माता मंदिर और होटल के पीछे घाटी के पार बीरा गांव और नौथा में संतरादेवी मंदिर के बारे में बताया। यहां से एक किलोमीटर आगे होटल एमवी अकोस्टा पर यू टर्न ले कर हम वीर दा ढाबा पहुंचे तब तक मैं अंदर ही अंदर बहुत उबल चुकी थी जो शायद मेरे चेहरे पर दिखने लगा था। राघव भैय्या ने वीर दा ढाबा से थोडा आगे गिरीष ढाबे पर मोपेड रोक कर संतरादेवी मंदिर चलने का उपक्रम किया तो मैं बोलना चाह कर भी चुप रह गयी। मेरी अकुलाहट को अंजली भाभी ने समझते हुए राघव भैय्या को कहा कि उनकी हालत नहीं रह गयी कि वे मंदिर तक चल सकें। राघव भैय्या ने अंजली भाभी की बात मानते हुए गाड़ी स्टार्ट की ओर हम आगे बढे।
हवा में ठंडक बढ़ने लगी थी और मैं शांत मन से अपनी योजना पर विचार कर रही थी। दो मिनट भी नहीं बीते कि राघव भैय्या ने फिर से हठपूर्वक दर्षने करने के लिये गाड़ी रोकते हुए कहा … ‘‘देखो भाई हम सुरक्षाकर्मियों के लिये शक्ति की उपासना बहुत आवष्यक है। समुद्र से छह हजार फीट की ऊंचाई पर मसूरी की नैनबाग तहसील के इस देवीकोल गांव में मां भद्रकाली का यह मंदिर कितना प्राचीन है यह कोई नहीं जानता लेकिन षिवपुराण और स्कंदपुराण में मां भद्रकाली को शक्तिदाता कहा गया है। इतना ही नहीं मां भद्रकाली भगवान श्रीकृष्ण की कुलदेवी अर्थात ईष्टदेवी होना भी कहा जाता है। इसलिये कोई ना नुकर नहीं चलेगी। ये मां भद्रकाली का वो दरबार है जहां बड़े-बड़े राजा महाराजा, सम्राट-शहंषाह अपना ताज, सिपाही अपनी तलवार और आम आदमी अपना सर्वस्व मां भद्रकाली के चरणों में अर्पित कर देता कर देता है और बदले में सम्राट अपने राज्य की सुरक्षा, सुख व समृद्धि, हम जैसे सिपाही शौर्य और पराक्रम और आम इंसान की सलामी मांगते हैं।’’
फिर मेरी तरफ देखते हुए बोले … ‘‘और अरूणिमा तुम्हें तो मना करने का अधिकार ही नहीं है। तुम उस दिन मां डाट काली मंदिर तो जा आये और रास्ते में भद्रकाली मंदिर नहीं गये जो एक गोरखा सेनिक के बलिदान का तीर्थस्थल है।’’
मैंने सकपकाते हुए अपना स्पष्टीकरण देना चाहा … ‘‘भैय्या उस दिन … वो … पहले ही देर हो गयी थी तो …।
राघव भैय्या ने आदेषात्मक स्वर में कहा … ‘‘आज कोई देर नहीं होगी, हम आधा रास्ता पार कर चुके हैं और अगले कुछ ही समय में हम पहाड़ी नर्सरी क्षेत्र में माधव भाई साहब के पास होंगे।‘‘
फिर शेखर को संबोधित करते हुए बोले … ‘‘अरे कविराज शेखर, तुम्हारा मुंह क्यों लटक रहा है? इन सुरम्य वादियों-घाटियों में तुम्हारा कवि हृदय कैसे …?
राघव भैय्या की बात पूरी नहीं हो पाई और शेखर ने राघव भैय्या के शब्दों को उलटते हुए अपने एक-एक शब्द को लंबा करते हुए कहा … ‘‘भाऽऽऽऽई, पहले तो इनके इंतेज़ार में सुबह से शांम हो गयी और अब तुम ट्यूरिष्ट गाइड़ बन कर पेट में पडी चाय और दो टोस्ट के नाष्ते का फलूदा बना रहे हो। ये रोटी की भूख है मेरे भाऽऽई, रोटी की भूख!! वो रोटी जिसके लिये बड़े-राजा, महाराजा, सम्राट और शहंषाह अपना तख़्त ओ ताज, सिपाही अपनी तलवार, इंसान अपना ईमान तो क्या मां भी अपने बच्चे को बेच देती है।’’
राघव भैय्या और शेखर के ये बदले हुए रूप उनके अब तक के रूप से सर्वथा विपरीत थे। मैं और अंजली भाभी अपने आष्चर्य का निष्चय भी नहीं कर पाई थी कि शेखर ने आगे कहा … ‘‘मेरे याऽऽर, तुम्हारा कुछ ही समय कितनी देर का है ये तो पता नहीं लेकिन, शक्ति मिलती है खाने से और अब इन वादियों-घाटियों में मुझे हर पेड़ पर रोटी लटकी नज़र आ रही है।’’
राघव भैय्या ने पूरे आक्रामक भाव से कहा … ‘‘अबे स्टेट खाकी के खाडकू, शक्ति से बड़ी सहनषक्ति होती है। एक वो हैं जो युद्ध की संभावित मुष्किलों के लिये चालीस दिन तक भूखे-प्यासे रहने का अभ्यास करते हैं और एक हम हैं जो नवरात्रों में नौ दिन भी बिना उपवास के नहीं रह सकते और उपवास के नाम पर साग आहार कर के पेट भर लेने को व्रत कहते हैं। अब थोड़ी देर और सहन कर, वहां माधव भाई साहब की व्यवस्था तेरी जन्म’जन्मांतर की भूख मिटा देगी।’’
राघव भैय्या की बात सुन कर हम सब खिलखिला कर हंस पड़े लेकिन सहनषक्ति के उनके ज्ञान की बात मेरे अंतर्मन को छू गयी। मुझे लगा राघव भैय्या ने मुझे ही इंगित कर के कहा हो कि अभी अगले दो दिन में न मालूम कब अवसर मिल जाएगा तो मैं क्यों परेषान हो रही हूं। अगले आधे घंटे तक राघव भैय्या और अंजली भाभी मां भद्रकाली मंदिर प्रांगण में अपनी भावी संतान के लिये मनोकामना करते रहे और मैं भी मां भद्रकाली से शेखर से दो टूक बात करने की शक्ति मांगती रही।
मंदिर से निकल कर राघव भैय्या ने किसी व्यावसायिक ट्यूरिस्ट गाइड की तरह कहना शुरू किया … ‘‘केम्पटी फॉल्स यहां से करीब सात किलोमीटर, बोले तो अधिक से अधिक पन्द्रह मिनट की दूरी पर है। वहां से करीब पांच किलोमीटर आगे रामगांव की तरफ मसूरी रेंज की वनविभाग की चौकी का क्षेत्र पहाड़ों से आच्छादित है इसलिये अंधेरा जल्दी हो जाएगा और चौकी तक का कुछ रास्ता कच्चा है इसलिये हमें वहां तक पहुंचने में पन्द्रह से बीस मिनट इस प्रकार कुल मिलाकर तीस-चालीस लगेंगे। लेकिन … ।’’
शेखर ने भूख से बिलबिलाते हुए कहा … ‘‘तुम्हारा लेकिन जान ले लेगा, अंधेरे में समय की आयु बढ़ जाती है मेरे भाई, इसीलिये दूसरी दुनियां के लोग 15 अक्टूबर से समय को एक घंटा आगे कर लेते हैं। तुम्हें भी इस भूखे की जान बचानी है तो तुम्हारे तीस चालीस मिनट को दस मिनट में समेट लो वरना …।
राघव भैय्या ने हंसते हुए शेखर को सम्बोधित कर कहा … ‘‘हम कैम्पटी फॉल्स से पहले ही हेलीपेड से रामगांव की तरफ पहाड़ी नर्सरी जाएंगे जो यहां से मात्र तीन किलोमीटर दूर है। यानी तुम्हारे चाहे अनुसार मैंने समय को खींच कर छोटा कर दिया है लेकिन आवष्यक और महत्वपूर्ण बात ये कि आगे जंगल और बहुत तीखे पहाड़ी मोड़ हैं जिन्हें हेयरक्लिप बैंड कहा जाता है। गाड़ी चलाने वाले से अधिक सावधानी पीछे बैठने वाले को रखनी है। कविराज शेखर, अपनी जठराग्नि को भूलकर अपने आंख, नाक और कानों को जागृत कर लो, क्योंकि ये पहाड़ और पहाड़ी लोगों की ये स्मृतियां जीवन में तुम्हें बहुत याद आएगी।’’
राघव भैय्या की बातों में छिपे अर्थों की तलाष में मैं मन में सोच रही थी कि अंजली भाभी ने अवसर पा कर कहीं राघव भैय्या को बता तो नहीं दिया या ये सब मेरे मन में छिपी मेरी ही भावनाएं मुझे ऐसा सोचने के लिये प्रेरित कर रही थी। अगले तीन किलोमीटर के सफर में हमारी गाडियों के बीच घटते-बढ़ते फासले मुझे भी कभी शेखर से सटकर बिठा जाते और कभी मैं संभल कर उनसे दूर हो जाती। कभी ढलान पर उतरते हुए झुकने के कारण मैं उनकी पीठ को छूने से बचने का झूठा प्रयास करती तो गहरे घुमाव पर लगने वाले ब्रेक मुझे उनकी पीठ पर सर रखने का बहाना बन जाते। ऐसे में शेखर का गुनगुनाना उस सिंदूरी शांम को और भी ख़ुषगवार बना रहा था। छितराए बादलों के झुरमुट में सूरज किसी नवविवाहिता सुहागिन के झुके हुए माथे पर झीने घूंघट में कलियों पर पंख फैलाए भंवों की चिड़िया के माथे पर सवार मंगल ग्रह सी लाल बिंदिया की तरह नज़र आ रहा था। पहाड़ की चोटियों और पेडों पर पसरी रवि रष्मियों से यहां वहां पसरी झील में उठती-गिरती जलराषि का आभास हो रहा था। हमारे बाईं तरफ घाटियों में सीढ़ियों जैसे खेतों से सर पे कटी हुई फसलों के भारे ले जाते ग्रामीण नर-नारियों के गीत गाते जा रहे पंक्तिबद्ध झुंड अपने नीड़ की ओर लौट रहे पंछियों की चहचहाहट से प्रतियोगिता कर रहे थे। दाहिनी तरफ घाटूधार के घने जंगल के बीच से कैम्पटी फॉल्स की तरफ जा रही सड़क पर रेंगती खिलौनों जैसी गाडियां अपनी-अपनी मंज़िल की तरफ जा रही थी। ऐसे में मैं शेखर से दो टूक बात करने के अपने मन के आवेग को भूल कर राघव भैय्या के शब्दों में कहूं तो इन क्षणों को अपनी स्मृतियों में सहेज लेना चाहती थी और चाहती थी कि शेखर इसी तरह मोटर साईकिल चलाते रहें और मैं उनके पीछे बैठी इन्हीं सड़कों को अपने जीवन की डगर बना लूं।
पहाडी नर्सरी से कुछ ही दूर पहले दाहिनी तरफ कैम्पटी फॉल्स की ओर जाने वाले मोड़ के आगे यमुना ब्रिज के पास एक नेपाली के ढाबे के पास पहुंचते-पहुंचते शांम घिर चुकी थी, पर्यटकों की गाड़ियां और आखिरी बस भी रवाना हो गयी थी। राघव भैय्या ने भीड़ से बचने और सड़कों पर ट्रेफ़िक कम होने तक कुछ देर रूकने को कहा तो मैं वर्तमान में लौट आई। समय व्यतीत करने के लिये चाय पीने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ। चाय का ऑर्डर देने के बाद राघव भैय्या ने शेखर की ओर देखते हुए कहा … ‘‘तुम कुछ खाने के लिये मंगवाना चाहो तो बोल दो लेकिन ज़्यादा मत खाना नही ंतो माधव भाई साहब का बनवाया हुआ खाना जंगली जानवरों को डालना पड़ेगा।’’
शेखर ने भी उसी अंदाज़ में कहा … ‘‘जी कप्तान साहब, अभी तो छह टोस्ट, बटर, शहद, छह चिकन सलामी, चार उबले हुए अण्ड़े, चार केले, दो सेब से सिपाही का काम चल जाएगा। ये वार्म अप होने के लिये काफी होगा बाकी आपकी आज्ञा हुई तो …।’’
राघव भैय्या ने शेखर को घुडकाते हुए कहा … ‘‘लो कर लो बात, चाचा कह दिया तो चौक चौबारे में चले आए!! चाय के साथ दो वेफर्स की जुगाली करो और आगे बढो।’’
शेखर ने मुंह रूआंसा बनाया तो राघव भैय्या ने सामने लखवाड़ और रामगांव से आगे दिख रहे गिरते जल प्रपात (कैम्पटी फॉल्स) को देखते हुए राघव भैय्या ने शेखर से पूछा … ‘‘कहो कविराज, मिश्री के पहाड़ और दूध के झरनों की काल्पनिक दुनियां से निकल कर कहो, देखा है कहीं ऐसा सुंदर मनोरम दृष्य?’’
शेखर ने समर्पण करते हुए कहा … ‘‘स्वप्न और कल्पनाएं अपनी जगह है और यथार्थ अपनी जगह!! वर्तमान का यथार्थ यह है कि आज तुम हमारे पथ प्रदर्षक हो और आज का दिन तुम्हारा है।’’
राघव भैय्या ने गर्व से गर्दन घुमा कर इधर-उधर देखा और अपना उतरांचल पर अपना ज्ञान बघारते हुए कहा … ‘‘तो सुनो कविराज, यमुनोत्री रोड पर मसूरी से 15 कि॰मी॰ दूर 4500 फुट की ऊंचाई पर यह इस सुंदर घाटी में स्थित सबसे बड़ा और सबसे खूबसूरत झरना है, जो चारों ओर से ऊंचे पहाड़ों से घिरा है। यह झरना पांच अलग-अलग धाराओं में बहता है, अंगरेज अपनी चाय दावत अकसर यहीं पर किया करते थे, इसीलिए इस झरने का नाम कैंपटी (कैंप$टी) फाल है। यहां पास ही कैम्प्टी झील है। जहां उपलब्ध नौकायन और टॉय ट्रेन की सुविधा पिकनिक मनाने के इच्छुक लोगों में को यहां खींच लाती है।’’
फिर शेखर की तरफ देखा जो नीचे घाटी में घरों में जल रहे चूल्हों से उठ रहे धुआं को देख रहे थे। उन्हें झिंझोड़ कर टटोलते हुए पूछा … ‘‘उधर क्या देख रहे हो? कहां खो गये? क्या सोच रहे हो?’’
शेखर ने अपने स्वर में गम्भीरता लाते हुए कहा … ‘‘देख रहा हूं इतनी ऊंचाई पर हो कर भी कोई गिर क्यों जाता है और सोच रहा हूं कि सुलगने वाले किस ऊंचाई पर जाना चाहते हैं जहां उनके धुआं-धुआं अस्तित्व का कोई मूल्य नहीं है?’’
राघव भैय्या ने शेखर के सामने चुटकी बजाते हुए कहा … ‘‘ओ भाई लौट आओ, चाय खतम हो गयी, रास्ता साफ है और मंज़िल भी पास है। फिर रात अपनी और बात अपनी। अब यहां से बिल्कुल आगे-पीछे मत होना और साथ-साथ चलना।’’
गहराती शांम के साए में अंधेरा अपने पांव पसारने को आतुर था लेकिन तेरहवीं का चांद अपनी चांदनी से उसके इरादों को धो रहा था। मैं शेखर के शब्दवृत में बंदी हो कर उनमें निहित अर्थ को समझने का प्रयास कर रही थी लेकिन जितना सोचती उतना ही उलझ कर रह जाती। थापा ढाबे से लगभग डेढ़ किलोमीटर आगे एक तीव्र घुमाव दाहिनी ओर आया तो कानों में किसी षिवालय की घंटियां गूंज उठी। मंदिर से घंटियों की आवाज़ के साथ आ रहे आरती के स्वर सुनकर शेखर ने धीरे से मोटर साईकिल रोकी और उतर कर घंटियों की आवाज़ की दिषा में मोड़ के बाईं ओर नीचे घाटी में देखने लगे। वहां से गुजर रही एक स्थानीय युवती से पूछने पर उसने बताया कि जंगल में प्राचीन मालीवाल महादेव मंदिर है जो पाण्डवों के समय का बताया जाता है।
घंटियों की समाप्त होती आवाज़ के साथ ही राघव भैय्या ने कहा … ‘‘चल मेरे भाई, बस सामने मोड़ पर दाहिनी तरफ उतरते ही जंगल में अपनी मंज़िल है। मुझे तो यहीं से ख़ुष्बू आ रही है।’’
यहां से माधव भाई साहब के पास पहुंचे तो वन विभाग की उस चौकी में काफी गहमा गहमी थी। माधव भाई साहब के तीन-चार मुस्लिम कर्मचारियों के परिवारों ने पैगंबर मोहम्मद के जन्मदिन के उपलक्ष्य में उस जगह को काफी सजा रखा था और एक तरफ टेंट की आड़ में चूल्हों पर पक रहे पकवानों की मिली जुली सुगंध वातावरण में फैल रही थी। थापा के ढाबे से इन्हीं चूल्हों से उठता हुआ धुआं देखकर कहा था ‘‘सुलगने वाले किस ऊंचाई पर जाना चाहते हैं जहां उनके धुआं-धुआं अस्तित्व का कोई मूल्य नहीं है?’’
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