मंदाकिनी पार्ट 11 / Mandakini part 11

हमारी बातों में निहित अर्थ केवल हम समझ रहे थे लेकिन मैं शेखर को जितना समझने का प्रयास करती उतना ही और उलझ रही थी। मैं शेखर के इस कथन का सिरा पकडने का प्रयास ही कर रही थी कि तभी डॉली और राहुल ने अपनी मंडली के साथ आ कर सभी को डांडिया में भाग लेने का हठ करते हुए डॉली ने मेरा व मीना का तथा राहुल ने शेखर का हाथ पकड कर हठ करते हुए सभी को डांडिया पांडाल पर ले गये। उन दिनों देहरादून में डांडिया नृत्य इतना प्रतिष्ठित और लोकप्रिय नहीं हो पाया था, पहाडी गीतों की ताल और लय का आवर्तन गुजरात के लोक नृत्य से मेल नहीं खा रहा था। डांडिया नृत्य के नाम पर हम सब के कदम तो पाकुला पहने सुवा रे सुवा बणखंडी सुवा जा नगरी में न्योत दे आ गीत और पहाडी लोकनृत्य नाटी और थडिया के स्टेप्स पर सभी एक दूसरे का हाथ पकडकर पैर आगे पीछे रखते हुए गाने की लय और ताल पर झूम रहे थे। ढोल, रणसिंगा, हुडकी वाद्ययंत्रों पर आरंभ में धीरे धीरे होने वाला यह नृत्य अपनी पूर्ण गति प्राप्त करने पर महिलाएं अपना नृत्य साथी चुन लेती हैं और शेखर के साथ उस वर्णनातीत नृत्य की स्मृति में आज भी मेरे पांव थिरक उठते हैं। ढोल, धंवाल, हारमोनियम, मषकबीन, रणसिंगा और हुडली के तीव्र स्वरों में सुवा रे सुवा गीत के शब्द पंखों की फडफडाहट कहीं दूर जा चुकी थी और सभी अपने अपने नृत्य साथियों के साथ प्रसन्नता और मस्ती के अतिरेक में झूम रहे थे तभी अजंली भाभी हरहरा कर गिर पडी। वाद्ययंत्रों के स्वर सभी नर्तकों की क्या हुआ क्या हुआ में प्रतिघ्वनित हुए, राघव भैय्या ने अंजली भाभी के चेहरे पर पानी के छींटे मारे तो चेतना लौटी। सब ने थकान और प्यास को कारण समझा लेकिन मां ने चिंतावष हमारी कॉलॉनी में रहने वाला डॉ. थपलियाल से आग्रह किया तो उन्होंने भाभी की नब्ज़ टओली और चेहरे पर कृत्रिम चिंता प्रदर्षित करते हुए कहा … ‘‘मिसेज रावत, ख़ुषी के अवसर पर मुंह लटकाना अच्छी बात नहीं है। अरे नाचो, गाओ, ख़ुषी मनाओ आप की बिटिया मां बनने वाली है।’’
ढोल, रणसिंगा और हुडली के स्वरों में एक नयी चेतना स्फुरित हुई और राघव भैय्या ने अंजली भाभी को गोद में ले कर नाचना शुरू किया। राघव भैय्या ने शेखर को उनके हेवरसेक से बांसुरी निकाल कर दी और शेखर ने नवआगंतुक बालक के लिये बांसुरी पर बहुत देर तक वृंदावन का कृष्ण कन्हैया सब की आंखों का तारा गीत की धुन पर सभी अंजली भाभी को केन्द्र में रखते हुए बहुद देर तक झूमते रहे। इस बीच मां ने माधव भाई साहब को भेज कर सूखे मेवे, फल, नारीयल, सुहाग का सामान चूडियां, बिंदी, ओढनी और घर में से कुछ गहने मंगवा लिये। सभी पुरूष कुर्सियों पर बैठ गये और महिलाओं ने मंगल गीत गाते हुए अंजली भाभी को आषीर्वाद दिया। ओढनी ओढाने के लिये भाभी के पीहर से कोई नहीं था तो शेखर ने अंजली भाभी को ओढनी औढा कर एक सौ एक रूपये दिये और दुर्गा अष्टमी का त्यौहार नव आगंतुम की पारीवारिक खुषी में बदल गया।
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अब आगे …
माधव भाई साहब, राघव भैय्या और शेखर पांडाल समेटने, हलवाई और टेंट वाले का हिसाब निपटाने के काम में और हम महिलाएं घर समेटने में व्यस्त रहे। मीना अब केवल मेरी अंतरंग सखी नहीं रह गयी थी बल्की पारिवारिक सदस्य हो गयी थी और वो साथ ही थी। सब कुछ समेटते समेटते शांम हो गयी लेकिन किसी का खाने का मन नहीं था फिर भी मां के आग्रह पर सभी ने बचा हुआ प्रसाद छत की बगिया में बैठकर खाया। खाना खाते हुए शेखर ने अंजली भाभी से कहा … ‘‘तो आज से तुम अंजली भाभी नहीं सिर्फ़ अंजली हो, मेरी छोटी बहन अंजली!
अंजली भाभी ने बहुत भावुक होते हुए कहा … ‘‘षेखर भैय्या, सच कहूं? जब आप मां दुर्गा की स्तुति कर रहे थे, मैं मन में सोच रही थी कि आप मेरे लिये भी प्रार्थना करें और तभी आप ने वो मंत्र बोला। आप ने कैसे जान लिया कि …?’’
शेखर ने बात काटते हुए कहा … ‘‘अरे नहीं, ये तो सिद्धेष्वर महादेव मंदिर में राघव के उस कलावे के छलावे में बंधी प्रार्थना है जो जगदंबा माता गौरी ने मंदाकिनी को शेखर के षिखर से उतार कर आपकी अंजुली में भेजा है।’’
राघव भैय्या ने झुंझला कर कहा … ‘‘यार शेखर, कभी तो सीधा बोला कर जो सब के एक बार में समझ आ जाए।’’
सब हंस रहे थे और मैं कलावों के छलावों में मंदाकिनी को शेखर के षिखर में उलझी मां, रष्मि भाभी और अंजली भाभी की चर्चा में शेखर की प्रषंसा और उसमें माधव भाई साहब व राघव भैय्या के समर्थन से मेरी कल्पनाओं में भविष्य की संभावनाएं खोज रही थी। खाना खाते हुए माधव भाई साहब ने अगले शनिवार को आने वाली शरद पूर्णिमा पर मसूरी में वन विभाग के अतीथिगृह से चंद्रदर्षन उत्सव का प्रस्ताव रखा गया तो अंजली भाभी और मीना ने तुरंत हां में हां मिला दी। मां ने कहा कि मंगलवार को दषहरे के बाद वैष्णोदेवी मंदिर से सुरक्षा ड्यूटी पूरी हो जाने पर एक दो दिन में बाबूजी आ जाएंगे लेकिन फिर भी घर को सूना नहीं छोडा जा सकेगा।
भाई साहब को सुबह मसूरी वापस जाना था तो वे और रष्मि भाभी चले गये। मीना भी कल नहीं आ सकने का कह कर जाने लगी। मैं उसे थोडा दूर तक छोडने गयी तो मीना ने नाटी नृत्य में कथडी स्टेप्स की चुटकी लेते हुए लाडो के सयानी होने का व्यंग कसा लेकिन मैं उसे मेरे अंदर उठ बैठ रहे आषा निराषा के ज्वार भाटे की चर्चा न कर सकी। मीना को छोड कर घर आयी तो दिन भर की थकी हुई मां दवाई ले कर सोने की तैयारी कर रही थी अंजली भाभी भी अपने कमरे में जा चुकी थी। राघव भैय्या और शेखर ड्राईंग रूम में बातें कर रहे थे। मैं पहुंची और राघव भैय्या ने मुझे बुलाया तो मेरे अंदर बहुत से सवाल, आषंका व कल्पनाएं हवा बन कर मन के पर्दों को फडफडाने लगे। जब राघव भैय्या ने दूसरे दिन सोमवार को महानवमी पर्व पर देहरादून की परंपराओं के बारे में जानना चाहा तो मेरी सांस में सांस आयी। कल के कार्यक्रम के बारे में चर्चा के बाद राघव भैय्या भी सोने चले गये मैं अपने कमरे में आयी तो मां सो चुकी थी।
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बहुत देर तक दिनभर का घटनाक्रम मेरी आंखों में चलचित्र की भांति घूमता रहा। शेखर के व्यक्तित्व की एक-एक विषेषता मेरे मन पर किसी फूल की पंखुडियों की तरह बरस रही थी और शेखर के शब्द दूर पहाडों में किसी षिवालय की गूंजती घंटियों की तरह मेरे कानों में बज रहे थे। आज का पांडित्य रूप, अंजली भाभी को ओढनी ओढाते हुए वो भावभीना चेहरा, हिमाचल के किसी आंचलिक गांव के प्रवीण नर्तक की तरह कथडी नृत्य में मेरी पीठ से मेरे पाकुला को पकड कर झूमते हुए वो अनुचित चेष्टाहीन हाथ और बांसुरी पर थिरकती उनकी अंगुलियां मेरे मन की वीणा के तारों को झंकृत कर रही थी। मेरी कल्पना में शरद पूर्णिमा की झिलमिल झिलमिल चांदनी में केतकी पुष्पों से श्रंगार किये रजनीगंधा की छांव में मैं उनके वक्ष से सटे उनके कांधे पर सर रखे उन्हें बांसुरी बजाते हुए अधखुली आंखों से निहार रही थी। बांसुरी के स्वर मेरी सांसों में घुलते गये और बेसुधी में मेरे होंठ बांसुरी के मुखरंध्र तक पहुंच गये तो बांसुरी मौन हो गयी और हमारे अधर परस्पर रसमाधुर्य से भीगने लगे। मन वीणा के तारों की झंकार हृदय के मृदंग से युति कर तन के तंबूरे पर काफी और खमाज थाट की राग मिलन गांधार की तान छेडने लगे। केवडे की सुगंध ले कर बह रही हवा ने रजनीगंधा के पुष्पों का बिछौना बिछा दिया। मैं प्यासी धरती की तरह फटे हुए कलेजे पर बिखरे बालों के धारे लिये किसी बटोही की प्रतीक्षा करती एक वीरान टापू सी पसरी थी। शेखर अमृत बूंदों का उमडता हुआ बादल बन कर मुझ पर छा रहे थे तभी सूर्य के तेज का एक प्रकाषपुंज उभरा और वो प्रेम पयोध उस रोषनी में विलीन हो गया। रजनीगंधा के फूलों का बिछौना प्यासी तपती धरती पर देवदार की सूखी चरमराती पत्तियां बन कर मेरी पीठ में चुभने लगी और केतकी पुष्पों का श्रंगार मेरी आह की तपिष में झुलस गया। मेरी तेज होती सांसों में मैंने शेखर शेखर पुकारना चाहा लेकिन मां के जाग जाने के डर ने मेरी आवाज़ का दम घोंट दिया।
दीवार घडी की तरफ देखा, रात के दो बज रहे थे। मां नींद की दवाई से गहरी नींद में थी। खिडकी के पर्दों से छन कर आ रही दुर्गा अष्टमी उपलक्ष्य में की गयी सजावट की रोषनी मेरे कमरे में चहलकदमी कर रही थी। पर्दों की छांव में पांव रखते हुए मेरी व्याकुलता ने आ कर मेरा हाथ पकड कर उठाया, मैंने मन को बहुत रोका लेकिन मेरे अंदर की अरूणिमा ने धकिया कर मुझे मंदाकिनी के झिलमिल तारों की छांव में बाहर बरामदे में पहुंचा दिया। बाहर की तरफ झांक रही र्ड्राइंगरूम की खिडकी से झांक कर देखा तो शेखर बाबूजी के तख्त पर वो सिंदुरी दुषाला ओढे एक पांव नीचे लटकाए ध्यानमुद्रा में बैठे थे। मैंने उनके ध्यान में बाधा नहीं बनने का सोचकर एक लंबी सांस ली बाहर खुले आसमान की तरफ देखा। आसमान एकदम साफ और तारों से भरा हुआ, ठहरी हुई हवा में तुलसी टिकटी में जलते दीपक की लौ को मैं एकटक देखती रही। दीपक की लौ का आकार बढने लगा और उस प्रकाषपुंज का तेज सहन न कर सकने से मैं गिरने को हुई कि जाने पहचाने स्पर्ष ने मुझे थाम लिया। बंद होती आंखों में मुझे केवल सिंदुरी दुषाला दिख रहा था।
मेरी चेतना लौटी तो मैं ड्राईंगरूम में उस तख्त पर लेटी थी और शेखर मेरे सिरहाने की तरफ कुर्सी पर बैठे अपने दुषाले के भीगे हुए कोने से मेरे चेहरे को पोंछ रहे थे। उन्होंने मेरे सर को सहलाते हुए बहुत आत्मीयता से पूछा … ‘‘अब कैसी हो मंदाकिनी?’’
मुझे चिढ और कुढन हो गयी थी मंदाकिनी नाम से लेकिन उनके आत्मीयता भरे स्वर में मेरी चिढ और कुढन काफूर हो गयी थी। मैंने बहुत थके हुए स्वर में लगभग प्रार्थना करते हुए पूछा … ‘‘षेखर! मैं जितना तुम्हें जानने की कोषीष कर रही हूं, और उलझ जाती हूं। मैं जानना चाहती हूं आखिर कौन हो तुम?
शेखर ने खिडकी से बाहर शून्य में देखते हुए कहा … ‘‘इसी प्रष्न में तो मैं भी उलझा हुआ हूं। यही तो मैं जानना चाहता हूं मंदाकिनी, कि कौन हूं मैं?
मैंने प्रतिप्रष्न किया … ‘‘ये कैसी पहेली है शेखर? तुम स्वयं को नहीं जानते? क्या तुम्हारे अस्तित्व में एक से अधिक शेखर हैं? यदि हां, तो यह कैसे संभव है?
शेखर ने कुंठित स्वर से कहा … ‘‘हां मंदाकिनी, जिसे गीता में क्षेत्र, क्षेत्री और क्षेत्रज्ञ कहा है। उपनिषदों में शरीर, सूक्ष्म शरीर, शरीरी, देह, देही, आत्मा, जीवात्मा और परमात्मा कहा है। जिस प्रकार जल के पात्र में भरा हुआ जल और जलपात्र एक हो कर भी अलग अलग हैं, मधुकुंभ में भरा हुआ मधु और कुंभ अलग अलग है। पृथकता और एकात्मता के इसी भ्रमजाल में मैं उलझा हुआ हूं मंदाकिनी!! और मुझे कोई मार्ग नहीं सूझ रहा।’’
न जाने कहां से मेरे अचेतन मन में दबी तर्कज्ञान की पोटली खुल गयी और मैं तख्त पर उसी आसन मुद्रा में बैठ गयी जिस मुद्रा में शेखर बैठे थे। अब मैं तख्त पर और शेखर मेरे सामने कुर्सी पर थोडा नीचे बैठे थे। मैंने एक षिक्षक की तरह बोलना शुरू किया … ‘‘और पृथक पृथक होने पर किसी भी तत्व की ना तो कोई उपयोगिता है, न उपादेयता। क्षेत्री के बिना क्षेत्र एक विजन वन, शरीरी के बिना शरीर एक शव और देही के बिना देह एक देव रहित देवालय ही तो होगा। एकाकी, एकांत और एकात्म को हम सामान्यतः एक समझ लेते हैं जबकि इन तीनों का नितांत पृथक पृथक अर्थ और महत्व है। एकांत में एकाकी जीवन का कोई लक्ष्य नहीं हो सकता और यदि हो भी तो अप्राप्य होने से वह अर्थहीन प्रयास से अधिक कुछ नहीं है। जिसे तुम एकात्म होना कह रहे हो वह दो तत्वें का योग ही तो है। दो पृथक तत्वों के योग से ही नवसृजन संभव है।’’
शेखर अब षिष्य की भांति पूछ रहे थे … ‘‘यही मेरी दुविधा है देवी मंदाकिनी!! योग दो मुक्त तत्वों का विलयन हो कर बंधन का सृजन करता है तो ये योग, ये विलयन, ये मिलन से होने वाला सृजन मुक्ति में बाधक है। फिर मुक्ति कैसे होगी?’’
नहीं मालूम कि वो शेखर के ध्यान से उस तख्त पर कोई शक्तिपात का प्रभाव था या कुछ और, मैं पूरी दार्षनिक भाव से बोली … ‘‘तो क्या शषिषेखर षिव ने सृजन नहीं किया? क्या गृहस्थ होना उनके सन्यासी होने में बाधक बना? मुक्ति की आकांक्षा में जिन दृष्यमान बंधनों से दूर भाग रहे हो क्या उस आकांक्षा का अदृष्य बंधन तुम्हें नहीं जकड रहा? कोई योगी वियोगी हो कर योग से प्राप्त होने वाले परमात्मा की कल्पना कैसे कर सकता है? तुम्हारी समस्या ये है शेखर, कि तुमने योग तथा अध्यात्म के सैद्धांतिक ग्रंथों का बहुत अध्ययन कर लिया और व्यावहारिक जगत से दूर चले गये। जबकि योगीजन तो आसक्ति रहित और युक्तियुक्त आहार विहार सहित कर्तव्यकर्म से कभी विमुख नहीं होते। सन्यास का अर्थ ग्रहस्थजीवन का त्याग और इन्द्रिय निग्रह नहीं वरन् कर्मफल में अनासक्ति और उससे निस्पृही होना है। और रही मुक्ति!! मुक्ति तो वो मिथ्या दिव्य स्थिति है शेखर, जो दिव्यात्माओं को भी प्राप्त नहीं है वरना श्रीकृष्ण अर्जुन से ये नहीं कहते कि तुम्हारे और मेरे अनेक जन्म हो चुके हैं जिन्हें मैं जानता हूं किंतु तुम नहीं जानते। जिस मुक्ति की तुम कल्पना और कामना कर रहे हो वो तो जड और स्थिर मृत्यु है। किंतु मृत्यु भी मुक्ति नहीं वरन एक पडाव है जहां सृजन विश्राम करता है।’’
जैसे कोई राही मार्ग भूलकर ठिठक जाए, शेखर भी उसी राही की तरह ठिठक कर रूकते हुए बोले … ‘‘अर्थात मुक्ति की आकांक्षा और जगत व जीवन का सत्य जानने का प्रयास व्यर्थ है?’’
मैंने षिक्षक के आसन की उच्चता, प्रतिष्ठा और गरिमा की मर्यादा रखते हुए स्पष्ट करते हुए कहा … ‘‘मुक्ति के लिये रातों को जाग कर जगत से भागना जागते हुए भी सोने जैसा ही है। जगत से भागने की नहीं, जागते रह कर जागने की आवष्यकता है। मुक्ति की आकांक्षा भी तो मुक्ति का बंधन ही है और यही कारण है कि कोई मर कर भी मुक्त नहीं होता। जहां बंधन है वहां मुक्ति कैसी? सदेह मुक्ति ही मुक्ति है। मुक्ति चाहिये तो सत्य के तत्वज्ञान के कपाट पर लगे मिथ्या ज्ञान के बंधन खोलने होंगें। इसी प्रकार सत्य असत्य भी जगत को देख रहे दृष्टा का दृष्टिभ्रम ही तो है। किसी भी दिषा में चलते हुए पृथ्वी के छोर पर पहुंच जाएंगे तो दिषा की संज्ञा बदल जाएगी। सुनो …’’
जगत वो जो गतिमान है।।
आना जाना मिथ्या भान है।।
इधर से देखो जा रहा है।।
उधर से देखो आ रहा है।।
स्थिती भिन्नता का भाव है,
आ रहा है ना जा रहा है।।
शून्य से शून्य आ रहा है।।
शून्य में शून्य जा रहा है।।
अद्भुत अनुभूती असहज है,
शून्य शून्य में समा रहा है।।
शेखर ने समर्पण करते हुए कुर्सी से उठ कर नीचे झुक कर संभवतः मेरे पांव छूना चाहते हुए कहा … ‘‘आज जिस शक्ति का दर्षन मैं कर पा रहा हूं, तुम्हारी पूजा करने को मन विवष हो रहा है मंदाकिनी।’’
शेखर की चेष्टा मात्र से मेरा नारी सुलभ कोमल भावनाओं का समंदर छलक उठा और मैंने उनके कांधों से पकड कर उन्हें रोका और उनके वक्ष से लगते हुए कहा … ‘‘मन से की जाने वाली पूजा विवषता नहीं होती और विवषता में की गयी पूजा केवल व्यवसाय है जिसमें पूजा और प्रसाद एक दूसरे के प्रतिफल हैं। स्त्री पृकृति की प्रतीक है शेखर, जिसका सौंदर्य पुरूष के पौरूष और पुरूषार्थ के अधीन है। मुझे मंदाकिनी कह कर तुमने अपने शीर्ष पर तो बैठा दिया किंतु मुझ जैसी कितनी ही मंदाकिनियां तुम्हारे प्रभामंडल में होंगी। उस प्रभामंडल में मैं एक छोटी सी अरूणिमा हूं और चाहती हूं हमेंषा के लिये तुम्हारे अस्तित्व में एकात्म जाऊं।’’
शेखर ने अपना बांया हाथ मेरे पीछे से लपेटते हुए मेरे बाएं कांधे को पकडा और दाहिने हाथ से मेरी चिबुक को छू कर बहुत धीरे से मेरा चेहरा उठाया। मैं अपनी आधी आधी बंद और आधी खुली आंखों से उनके चेहरे के भाव पढना चाहते हुए भी ऐसा नहीं कर सकी। बस इतना देख सकी कि शेखर के कांधों पर पडा दुषाले का एक छोर अब मेरे कांधे पर भी था और हम दोनों उस दुषाले में लिपटे हुए एक ही रंग में रंग गये थे। इसी स्थिति में हम दोनों तख्त पर बैठ गये। तब शेखर ने कहा … ‘‘आंखें खोलो मंदाकिनी और मुझे तुम्हारे अंतस में झांकने दो। मुझे अरूणिमा के उस हृदय का बिंब देखने दो जहां ज्ञानज्योति की उषा करवटें ले रही है।’’
मैंने बुदबुदाते हुए कहा … ‘‘मंदाकिनी के अंतस में शेखर के प्रेम रवि की अरूणिमा सुबह की उषा बन कर करवटें ले रही है। आंखें खोलने पर उसके सपने बिखर जाएंगे।’’
शेखर ने अपने अधर मेरी आंखों पर रखते हुए कहा … ‘‘मार्ग में सहमार्गी तो कोई भी अपरिचित हो सकता है लेकिन सहयात्रियों का परिचित होना …’’
मेरी आंखों पर शेखर के अधरों के उस स्पर्ष ने मेरे अंदर सुप्त प्रेम प्रपात को स्फूर्त कर दिया। पहाडों से उतर कर मैदान में पसरती मंदाकिनी की तरह तख्त पर लेटते हुए मैंने शेखर की बात काटकर कहा … ‘‘प्रेम किसी परिचय का मोहताज नहीं होता, ये संबंध तो दिव्यलोक में तय होता है वरना कहां तुम अपना स्वर्ग रचने वाले विष्वामित्र कहां मैं …’’
शेखर का बांया हाथ मेरा सिरहाना बना हुआ था। मैं उनकी तरफ करवट लिये उनकी कमीज के बटन से खेल रही थी। शेखर का दाहिना पांव मेरे पांव से लिपट कर मेरी पगतलियों से रेखाएं मिटाने को धीरे धीरे मल रहा था और दाहिना हाथ मेरे ललाट पर बिखरी केष लटों में अंगुली फंसाए वे मेरे अधरों पर कोई गीत सा लिख रहे थे। अचानक उन्होंने अपनी सभी चेष्टाएं बंद कर मुझे अपने वक्ष पर खींचते हुए दृढतापूर्वक कहा … ‘‘मैं विष्वामित्र नहीं हूं और तुम भी मेरी तपस्या भंग करने के लिये किसी इन्द्र की भेजी हुई मेनका नहीं हो। हमारे विषुद्ध प्रेम की ये मिलन यामिनी खमाज और थाट की मिलन गांधार का गंधर्व प्रेम बन कर हमारे परिवारों और आने वाले वंषजों के लिये लज्जा का हेतु बने उससे पहले लौट जाओ अरूणिमा, लौट जाओ।’’
शेखर के इन शब्दों से किंचित आष्चर्य हुआ लेकिन जल्दी ही मुझे भी अपने स्व का भान हो चुका था। मैंने शेखर के सीने पर सर रख कर सुबकते हुए कहा …
मेरे अन्तस के शून्य में
तब कोई काल नहीं था
एकान्त से कोई रंज नहीं
नीरवता का मलाल नहीं था
नित्य विस्तारित होते शून्य में
स्व की तलाश सी चलती रही
निष्चेष्ट इच्छाओं के शव में
चेतना पलाश सी जलती रही
निरंतर सुलगती हुई ज्वाला पर
सदियों रहे तिमिर वसन के पहरे
समय के टूटते बनते चक्र ने
मुझमें भर दिये पलों के चेहरे
पलों के इन चेहरों की आहूती से
निर्मित होते रहे श्वास तन और मन
ये क्रम आज भी निरंतर चल रहा है
मेरे अन्तस के विस्तीर्ण होते शून्य में
पल प्रतिपल निर्मित हो रहा है काल
मेरा स्व इसमें हर पल जल रहा है
तुम्हारे हृदय द्वार की देहुरी पर
तुलसी मंजरी बन कर बिखर गयी
मेरे जीवन की सुप्त आषाएं
सिंदूरी सुबह सुनहरी शांमों को
मेरे अंतस के पीपल की जडों में
जलता रहेगा प्रेम दीपक और
अंधियारों से लडती रहेगी
कुंवारी प्रीत हमारी
मैं अपनी आंखों के समंदर में
सपनों के अंबर की हर बूंद समेटे
सूखे चंदन सी समिधा काया ले कर
जीवन की शांम का सिंदूरी दुषाला ओढे
उस पार समय सिंधु के तट पर
करूंगी प्रतीक्षा तुम्हारी।
ना तृष्णा ना आशा
बस एक जिज्ञासा
कब होगी पूर्णाहुती
कब होगी पूर्णाहुती
शेखर ने मुझे सहलाते और मेरे माथे व आंखों को चूमते हुए कहा … ‘‘उठो अरूणिमा, आज का ये समय याद रखना। देखो षिवालय से आ रहे शंखनाद इस क्षण के साक्षी हैं कि तुम्हारे दिये हुए इस सिंदूरी दुषाले का रंग देहरादून के पूर्वी क्षितिज पर अरूणिमा बन कर मेरा मार्ग प्रषस्त कर रहा है। तुम्हारे इन निष्छल शब्दों ने मेरे मन और मस्तिष्क में तुम्हें हमेंषा-हमेंषा के लिये स्थापित कर दिया है।’’
‘‘इस समय मैं तुम्हें केवल इतना कह सकता हूं कि तुम्हारे निष्छल प्रेम की ये स्मृति अखंड ज्योति बन कर हमेंषा मेरे हृदय में प्रज्वलित रहेगी। हम कहीं भी हों, कल जब ये समय अतीत बन जायेगा तब मन के आंगन में तुम्हारे सामीप्य की सुखमयी यादों का दीपक जलाकर जीवन के अन्जान अनिष्चित अन्धेरे पथ पर चलता रहूंगा। इस दीपक में तुम्हारे विष्वास का तेल, श्रद्धा की बाती, आस्था की लौ और तुम्हारे प्रेम का उजियारा होगा। विष्वास टूटेगा नहीं, श्रद्धा मिटेगी नहीं, आस्था समाप्त नहीं होगी और हमारा ये प्रेम मंदाकिनी की कलकल में अमर रहेगा।’’
मैं अपने कमरे में आ कर मां के पास लेट गयी, शेखर के साथ की उस दिव्य अनुभूति ने मेरे अंदर एक उजास सा भर दिया था और मैं बहुत जल्दी गहरी नींद में सो गयी जिसमें कोई सपना नहीं कोई कल्पना नहीं बस, शेखर के स्पर्ष में सुख और सुरक्षा का आभास और उनके शब्दों से मिली शक्ति से जागृत हुआ मेरा आत्मविष्वास।
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