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मंदाकिनी पार्ट 23 / Mandakini part 23

मंदाकिनी पाट 23
नवीनतम एपिसोड्स को पढ़ते हुए आप को लगेगा कि मैं गढ़वाली भाषा का अपना ज्ञान बघार रहा हूं। लेकिन मैंने कहा न ये कहानी एक हक़ीक़त है जिसे में अफ़साने की तरह बयान कर रहा हूं। जहां तक गढ़वाली भाषा का सवाल है तो गढ़वाली, राजस्थानी, गुजराती और नेपाली इतनी मिलती जुलती भाषा है कि दस महीने के प्रवास में कोई भी राजस्थानी इन क्षेत्रों की भाषा में पारंगत हो सकता है। फिर मुझ जैसा रमते जोगी और बहते पानी के लिये उस वातावरण को आत्मसात कर लेना कोई बड़ी बात नहीं थी। संयुक्त राष्ट्र संघ के मिशन एरिया में जितने लोगों के सम्पर्क में आया, तो उनकी ही भाषा में बात करने पर उन्हें आश्चर्य होता था। हां ये बात ज़रूर है कि जिस प्रकार कोई भी कला अभ्यास के बिना शिथिल हो जाती है उसी प्रकार भाषा भी है। एयरफोर्स का फाइटर पायलट हो या एक सामान्य ट्रांस्पोर्ट पायलट या एक एरोपी, छह महीने से अधिक फ्लाईंग से दूर रहे तो उसे भी अभ्यास फ्लाईंग की औपचारिकता करनी पड़ती है। मैं तो बत्तीस साल बाद गढ़वाली भाषा का अपना शब्दकोष …
आप एक राजस्थानी बबूल के ठूंठ की छांव में गढ़वाली बयार का आनंद लीजिये।
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नींद खुली तो पूरी तरह से तैयार अंजली भाभी सामने थी और कह रही थी … ‘‘अरे उठा जागा अरूणिमा जागा, कब बिटि च कागा उड़ि-उड़ि करी काका-काका घर-घर जागोणू तम सणी। उठी गैन पंछी करण लगि गैन जय-जय। घुमूती घूगूती घुगति घुगता की अति भली-भली मीठी बोली मधुर मदमाती मुदमयी, उठा जागा बेगी त्यार बिच लागा। इन्षु लगडू आज मावठ की बारिष आये सकड़ू।’’ अर्थात अरे अरूणिमा उठो जागो, कागा उड़ता हुआ घर—घर जा कर लोगों को जगा रहा है, पंछी मंगलगान गा रहे हैं और घुघूती नाम की चिड़िया अपनी मीठी मीठी बोली में चहक रही है। उठो जागो और जल्दी तैयार होने में लगो। ऐसा लगता है जैसे आज मावठ की बारिश आने वाली है।
मैंने अंजली भाभी को लगभग खींच कर अपने बिस्तर में लिया और उनसे कहा … ‘‘मैं बहुत ख़ुष हूं भाभी, बहुत ख़ुष!! भ्वीं मा खुटो नि धरेन्दा।’’ अर्थात ख़ुषी के कारण मेरे पांव ज़मीन पर नहीं है।
अंजली भाभी ने आष्चर्य से पूछा … ‘‘मैं भी तो सुनूं हमारी लाड़ो क्यों ख़ुष है? शेखर से बात हुई क्या?’’
मैंने बैठते हुए अंजली भाभी को राघव भैय्या द्वारा बतायी हुई शेखर के मालीवाल महादेव मंदिर जाने की बात बताई तो उन्होंने शेखर के बारे में हमारी धारणा को गढ़वाली मुहावरे ‘कितुला कु नाग अर बिरला कु बाघ’ अर्थात केंचुए को नाग और बिल्ली को बाघ कह कर खेद जताते हुए सारा दोष परिस्थितियों का बताया। राघव भैया और शेखर के वापस आने का समय हो चला था, अंजली भाभी ने मुझे जल्दी तैयार होने के लिये कहा तो मैं स्नानागार में चली गयी और वो ख़ुद पीछे वाले टेरेस पर कुर्सी लगा कर बैठ गयी। बीस-पच्चीस मिनट में नहा कर बाल सुखाते हुए टेरेस पर बैठी मैं अंजली भाभी से बात कर ही रही थी कि इन्टरकॉम की घंटी घनघनाई और स्वागतकक्ष के परिचारक ने बताया कि कोई चांदनी रावत हम से मिलने आई हैं। स्वागतकर्ता को उन्हें मेरे कमरे में भेज देने का कहा। मैंने अंजली भाभी को बताया और मेरे कपड़े पहन कर तैयार होते-होते चांदनी ने आ कर हम दोनों को अभिवादन करते हुए कहा … सिवासौॅळी जसीलो बिनसरी जीजी, ती कन छे? अर्थात नमस्कार शुभ प्रभात दीदी, आप कैसे हो?
मैंने उसका स्वागत करते हुए कहा … ‘‘सुऔण चांदनी, जसीलो बिनसरी, मी असल छू। ती कन छे? अर्थात स्वागत है चांदनी, मैं अच्छी हूं। तुम कैसी हो?
चांदनी ने उत्तर दिया … ‘‘मी भी असल छू, तिम्यै अंग्वाळ पौंडल्या चितौयो। अर्थात मैं भी अच्छी हूं। आप से मिल कर ख़ुषी हुई?
अंजली भाभी ने उसे गले लगाते हुए कहा … ‘‘सुऔण सुऔण।’’ अर्थात स्वागत है स्वागत है।
चांदनी ने अंजली भाभी से पूछा … ‘‘पण दाज्यू कन छे?’’ अर्थात लेकिन दादा कहां है।
राघव भैय्या ने दरवाज़ा खोलकर अंदर आते हुए कहा ‘‘दादा यहां है। और अब तुम लोग चल कर रिसॉर्ट के मसूरी झील व्यू प्वाइंट वाले खुले रेस्तरां में नाष्ता लगवाओ, इतनी देर में मैं और शेखर तैयार हो कर आते हैं।’’
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मसूरी झील व्यू प्वाइंट के उस भाग से सामने घाटी में राघव भैया और शेखर तैयार हो कर आये तभी मुखिया पानसिंहजी भी आ गये थे। रिसॉर्ट के मैनेजर डौंडियाल उनकी अगवानी करते हुए हमारे पास आये और औपचारिक अभिवादन व स्वागत सत्कार के बाद उन्होंने हम से हमारे ठहरने और विश्राम में सुविधा बाबत पूछा। मैनेजर डौंडियाल ने बताया कि रात में जोगेन्द्रसिंहजी रावत के घर से नाष्ते के लिये विषेषतः हमारे लिये भेजे गये चूजों के कटलेट्स भांग की चटनी के साथ तैयार हैं तो मैंने और अंजली भाभी ने संकेत ही में समझ लिया कि रात में रिसॉर्ट के चौकीदार ने जिन दो महिलाओं के आने और हमारे बारे में पूछना बताया था वो चांदनी ही अपनी मां के साथ रिसॉर्ट आई थी जो हमें रावतजी की टापरी के पास मिली थी। हमारा रहा-सहा संषय भी समाप्त हुआ ही था कि राघव भैय्या, शेखर और जोगेन्द्रसिंहजी रावत भी आ गये।
मुखिया पानसिंहजी औपचारिक अभिवादन के बाद आवष्यक कार्यवष जौनसार जाने का कह कर हम सब से क्षमा याचना करते हुए विदा हो गये तब जोगेन्द्रसिंहजी रावत ने बात शुरू करते हुए कहा … ‘‘पौंडल्या पौणखि जिम्मुस। यो रिसॉर्ट भौत स्वादि खाणो बनाछ।’’ अर्थात खाना शुरू करें, इस रिसॉर्ट में खाना बहुत अच्छा बनता है।
राघव भैयया ने भुने हुए चूजे के पकौड़े को भांग की चटनी में डुबोते हुए कहा … ‘‘बीस किलोमीटर की दौड़ के बाद हाड़ तोड कसरत से पेट में चूहे कूद रहे हैं, जै की लद्वड़ि लगी आग, उ क्या खुज्योलो साग। पण आज सब्बी डांडा कुयड़ को कारण लुक्या छी।’’ अर्थात जिस को भूख लगी हो वो सब्जी नहीं ढूंढता, लेकिन आज पहाड़ की सभी चोटियां धुंध के कारण छुपी हुई है।
जवाब चांदनी ने दिया … ‘‘हां आज सुबेर लेकि छींटा पोड़ ग्या। हमार मसूरी मा सबसे ज़्यादा बरखा हूंद। इन्षु लगडू आज मावठ की बारिष आये सकड़ू अर् ह्यूं जल्दी गिरी।’’ अर्थात हां आज सुबह छींटा छांटी हुई है। हमारी मसूरी में सबसे ज़्यादा बरसात होती है। ऐसा लगता है आज मावठ की बारिष हो सकती है और इस बार बर्फ़ जल्दी गिरेगी।
अंजली भाभी ने गरम चिकन कटलेट को पेपर नेपकिन से पकड़ कर कंपकंपाते हुए कहा … ‘‘या पहाड़ मा रैण भोत असोंग छ। बरसात मा डॉंड़ो का भ्याल खतरनाक हुन्दी। इ सांची कि दिवतों की मार, न खबर न सार। पण मैं पहाड़ मा घुमण जाणू छों।’’ अर्थात भई पहाड़ में रहना बहुत कठिन है, यहां वर्षा ऋतु में पहाड़ों की ढलान बहुत खतरनाक होती है। सच है कि देवताओं के न्याय का ना तो कोई पता है न उसका कोई हल है। लेकिन मुझे पहाड़ घूमने जाना है।
फिर चांदनी की तरफ देखते हुए पूछा … ‘‘कि तुम भी हमार दगड़ी चलदन क्या?‘‘ अर्थात क्या तुम भी हमारे साथ चलोगी?
चांदनी ने चहकते हुए उत्तर दिया … ‘‘पहाड़ मा भोत घुमण वाली जग्गा छन।’’ अर्थात पहाड़ में घूमने की बहुत जगह है।
फिर अपने पिता जोगेन्द्रसिंहजी की तरफ देखते हुए बोली … ‘‘पण अच्गाळू पहाड़ मा काफल होळा पक्यां। जन …‘‘ अर्थात लेकिन आजकल पहाड़ में होळे (चावल की फसल) काफी पक गयी है। इसलिये …
अंजली भाभी ने चिकन कटलेट उदरस्थ कर कहवे का एक घूंट लिया और चांदनी को प्रेरित करते हुए कहा … ‘‘एक दिन मा किं फ़र्क़ पड़ छ?’’ अर्थात एक दिन में क्या अंतर पड़ेगा।
चांदनी ने अपने पिता जोगेन्द्रसिंह रावत की तरफ उदास हो कर देखते हुए कहा … ‘‘जे गौं जाणु नी, वे को बाटू किले पुछण?’’ अर्थात जिस गांव जाना नहीं उस का रास्ता क्या पूछना।
बहुत देर तक हमारी बातचीत से उकताए राघव भैय्या ने अपनी प्लेट में चिकन कटलेट लिये और हमें टोकते हुए कहा … ‘‘भई पहाड़ों में एक कहावत है नादान कु दगड़ू, जी को जंजाल। मेरा भाई शेखर एक लाइन का चुटकुला सही सुनाता है कि दो महिलाएं चुपचाप बैठी थी। जोगेन्द्रसिंहजी, अब आप ही …।’’
जोगेन्द्रसिंहजी ने तपाक से राघव भैय्या की बात काटते हुए मुझे संबोधित किया और पूछा … ‘‘त्वे कति बरस की छौ?’’ अर्थात तुम्हारी उम्र कितनी है।
मैं इस आकस्मिक प्रष्न के लिये तैयार नहीं थी और थोड़ी सकपका गयी तो जोगेन्द्रसिंहजी ने अपनी बात बढ़ाते हुए कहा … ‘‘तुम ब्यौ कब छो कन? तुमरी तो ब्यौ की उम्र होगि। मिल तो अपरी न्यौंनि को ब्यौ बाल्यकाल मा हि कर दयाई।’’ अर्थात तुम विवाह कब कर रही हो? तुम्हारी तो विवाह की उम्र हो गयी! मैंने तो मेरी बेटी का विवाह बाल्यकाल में ही कर दिया था।
मैं अब तक अपनी भावनाओं पे नियंत्रण कर चुकी थी इसलिये अचानक छा गये भारीपन को कम करते हुए कहा … ‘‘माफ़ गरूस्, म्यै नीं थाह छन्, पण् मिल विंग् छु कि ब्यौ का जोड़ा तो कनि सरग मा हि बनदी!’’ अर्थात क्षमा कीजिये मुझे नहीं पता लेकिन मैं समझती हूं कि विवाह के जोड़े तो शायद स्वर्ग में ही तय होते हैं।
चांदनी ने मेरे कांधे पर सर झुकाते हुए कहा … ‘‘दिदि, देख दौं हम पहाड़ी लोगूं को यो कतना बुरो रिवाज छ कि न्यौंन्यूं को ब्यौ बुड़्यो से कर देंदन। इना करण से त जैं दिन न्यौंनि निजै वे दिन हि दतेरे द्योन त अच्छो हो। जिं़दगीभर को रोण-धोण से नि होण ही भलो।’’ अर्थात देख लो दीदी, हम पहाड़ी लोगों की ये कितनी बुरी परंपरा है कि बेटियों का विवाह वृद्धों से कर देते हैं। इसी कारण बेटी जिस दिन जन्म ले उसी दिन मर जाए तो अच्छा हो। जिं़दगीभर का रोना-धोना होने से तो नहीं होना ही भला है।
चांदनी की व्यथापूर्ण बात से जोगेन्द्रसिंहजी भी कुछ व्यथित दिखे और उन्होंने मेरी अध्यापिका की क्षमता को सम्बोधित करते हुए मुझ से कहा … ‘‘गुरूजी, हमार न्यौंनिं ते भी द्वि आखर सीखाई देन।’’ अर्थात हमारी बेटी को दो अक्षर सिखा दो।’’
चांदनी की बातों में बालविवाह की स्मृतियां मुखरित हो कर दुख का आभास करवा रही थी लेकिन मेरे मन में बचपन और युवावस्था का मंथन चल रहा था। मैंने उसे हल्के-हल्के सहलाते हुए कहा … ‘‘सानो छदा यो मन कति सफा कोरा कागज जस्यो हुंतो। अहिले बाल्यकाल बितेर कुन्नी किन हो, यो मन फुटेको सीसा जस्यो हुंतो। बचपन को याद आउँ छ कति रमाइलो थियोे ती दिन, समयले के-के मन्तर लगाएर बिगारी दियो यि दिन। न मतलब थियो न त यो स्वार्थी संसार को डर हुंतो, नथाकिन्थे न रोकिन्थे ती रहर। जिउन त जिन्दगी बचपन मात्र रहे छ, अहिले त यो जिन्दगी सैतान मात्र छ!’’ अर्थात जब हम छोटे थे तो ये हृदय कितना साफ़ था! न जाने क्यों अब वो बचपन बीत कर ये हृदय टूटे हुए कॉंच सा हो गया है। कितने आनंददायक थे वो बचपन के दिन कि न इस स्वार्थी दुनिया की परवाह थी ना डर था। जीवन जीना तो केवल बचपन में है कि ना हम थकते हैं ना हमारी इच्छाएं। आज तो समय ने कैसे-कैसे मंत्र फूंक कर हमारा वर्तमान बिगाड़ दिया कि अब ये जीवन केवल और केवल एक शैतान है।
राघव भैय्या ने विषयांतर करते हुए शेखर को आमंत्रित किया और कहा … ‘‘भाई शेखर, मसूरी की ये सुहानी सुबह देखते ही देखते दोपहरी में बदल जाएगी और तुम सारे चिकन पकौड़े ऐसे खा रहे हो जैसे दोपहर को रोटी नहीं मिलेगी। बस कर यार, यहां चांदनी और अरूणिमा की भारी-भारी बातों से मन भारी हो रहा है।’’
शेखर ने भांग की चटनी में लिपटा एक चिकन कटलेट मुंह की तरफ ले जाना रोकते हुए कहा … ‘‘इसमें किसी को दोष देने की आवष्यकता नहीं है। आज शरद पूर्णिमा है और आज के ग्रह गोचर की स्थिति ही ऐसी है कि चंद्रमा मीन राषि में और मंगल कन्या राषि में आमने-सामने होने से दोनों में द्वंद्व की स्थिति बनी रहेगी। इतना ही नहीं चंद्रमा हस्त नक्षत्र में रहेगा जो चंद्रमा के स्वामित्व का नक्षत्र है अर्थात दोनों में द्वंद्व का एक और कारण। इस प्रकार दिन तो भारी रहेगा लेकिन अच्छी बात ये है कि चंद्रमा पर बृहस्पति की दृष्टि पड़ने से गजकेसरी का शुभ संकेत भी बन रहा है तो शांम तक स्थिति अच्छी हो जाएगी जो प्रेम के प्रकटीकरण का शुभ मुहूर्त लेकर आयेगा। लेकिन ये स्थिति बहुत समय तक नहीं रह पाएगी, मेष और तुला राषिवालों के लिये यह स्थिति बहुत जल्दी बदल जाएगी और केवल एक माह में ये संयोग एक दुर्योग में बदल जाएगा। उससे भी अधिक अस्थिरता अगले तीन माह में आएगी जब केसर की क्यारियों में बारूदी गंध फैलेगी और घाटी से बहुत सारे लोग पलायन करेंगे। अब ये और बोनस में बता दूं कि ठीक ऐसी ही स्थिति आज से बत्तीस वर्ष बाद सन 2021 में आएगी जब ऐसी ही अस्थिरता के वातावरण में पलायन किये हुए लोग फिर से अपने घर आएंगे और बिछुड़े हुए लोगों को उनके प्रियजन सम्पर्क में आएंगे।’’
इतना कह कर शेखर ने कटलेट को अपना निवाला बनाया और हम तो शेखर के ज्ञान, दर्षन और अध्यात्म से थोड़ा बहुत परिचित थे लेकिन इस बात से अनभिज्ञ जोगेन्द्रसिंहजी ने कौतुहल से शेखर की तरफ देखा और आष्चर्यमिश्रित जिज्ञासापूर्वक पूछा … ‘‘कति तिमि योतिषी छौ?।’’ (क्या तुम ज्योतिषी हो।)
उत्तर राघव भैय्या ने दिया … ‘‘रावतजी मेरू यार किं छ? यो तो यो ख़ुद भी नीं जाणुस, पण यो रमतो योगी योतिष भी जाणु छ।’’ अर्थात रावतजी मेरा मित्र क्या है? ये तो ये स्वयं भी नहीं जानता लेकिन ये रमता योगी ज्योतिष भी जानता है।
रावतजी ने राघव भैय्या की बात अनसुनी करते हुए चांदनी का हाथ पकड़ कर शेखर के आगे करते हुए कहा … ‘‘आप त सिद्ध पुरूष छावा। जर म्हारू ल्होड़ी का हथ त देखा।’’ अर्थात आप तो सिद्ध पुरूष हो। ज़रा मेरी पुत्री का हाथ तो देखो।
मेरी और अंजली भाभी की उत्सुकता बढ़ गयी थी और शायद मेरी चिंता भी जब शेखर ने चांदनी का हाथ कुछ देर उलट-पुलट कर देखने का उपक्रम किया और फिर चांदनी की आंखों में देखते हुए हास्यपूर्वक कहा … ‘‘हथ देखा त पेली एक कथा सुणु।’’ अर्थात हाथ दिखाने से पहले एक कथा सुनो।
एक योगी घुमद-घुमद कै गाऊ क पास पहुची जख कोई थोकदारनी अप्णों नै घर छा बणणा! जनी चौक मा गैनी योगी बोळ्यो .. जजमान सुखी रा, घर अन्न धन्न से भुरियू रा। अर्थात एक योगी घूमते-घूमते एक गांव में पहुंचा जहां एक थोकदारनी का घर था। घर के चौक में जा कर योगी ने आवाज़ लगायी … ‘‘यजमान सुखी रहो, घर अन्न और धन से भरा रहे।’’
थोकदारनी आसण बिछाई, उथै योगी न बोली ‘‘इत बैठा, आप त सिध पुरुष छावा। जर मारु हथ त देखा धो? अर्थात थोकदारनी ने आसन बिछा कर उस योगी से कहा … ‘‘हे सिद्ध पुरूष आईये यहां बैठिये। ज़रा मेरा हाथ तो देखो।’’
योगी उकु हथ पकडी ह्थ्गुली थै गौर से देखी क्य बोलि … ‘‘भै जजमान, एक बात बोलु? अर्थात योगी ने उसका हाथ पकड़ कर हथेली को गौर से देखा और बोला … ‘‘हे यजमान, एक बात बोलूं?’’
थोकदारनी बोली .. ‘‘हां-हां योगी बोलो, सब ब्वाला। बे झिझ्क से ब्वाला। अर्थात थोकदारनी ने कहा … ‘‘हां-हां योगी बोलो सब बोलो। बिना संकोच बोलो।’’
योगी थोकदारनी क्य हथ पकड़ी-पकड़ी बोली … ‘‘तेरी रेखा बतोणि छी कि त्वै म पैसो कि क्वी कमि नि न। त्वैमु त पैसै पैसा राला।’’ अर्थात योगी ने थोकदारनी का हाथ पकड़े-पकड़े कहा … ‘‘तुम्हारी रेखा बताती है कि तुम्हें पैसे की कोई कमी नहीं है। तुम्हारे पास तो पैसा ही पैसा है।’’
थोकदारनी बेधडैक जोगी कु मुख देखी अर बोली .. ‘‘ठीक छा बुना। सत बचन। बडी मुश्किल से त, एक रुप्या आन्द! अर वोभी थोडा देर मा रैजगरी म बद्लि जान्द! निन्यानबे से कभी उबु हि नि गै! अर्थात थोकदारनी ने निसंकोच हो कर योगी के चेहरे की तरफ और कहा … ‘‘ठीक है सत्य वचन। बहुत कठिनाई से एक रूपया आता है और वो भी थोडी ही देर में रेजगारी में बदल जाता है। निन्यानवे से ऊपर कभी होता ही नहीं है।’’
फेर थोकदारनी उठी, भितर बिटि एक चवन्नी लैकि उथै जोगी कु दे की बोलि .. ‘‘ल्याव आपै भेंट.!’’ अर्थात फिर थोकदारनी उठी और अंदर जा कर एक चवन्नी ला कर उस योगी को दे कर बोली … ‘‘लो आप की भेंट!’’
योगी चवन्नी देखि क अचरज से बोली … ‘‘यु क्या, चवन्नी?’’ अर्थात चवन्नी देख कर योगी ने आष्चर्य से कहा … ‘‘ये क्या, चवन्नी?’’
तो थोकदारनी योगी स बोली … लगद च की मेरी अर तुमरी भाग्य रेखा एक जनी छ्न। ई चवन्नी मा पिचहत्तर पैसा ओरी मिलैक एक कल्दार ब्णै लिया! अर्थात तब थोकदारनी ने योगी से कहा … ‘‘लगता है कि मेरी और तुम्हारी भाग्यरेखा एक जैसी है। इस चवन्नी में पिचहत्तर पैसे और मिला कर एक कलदार रूपया बना लेना।’’
शेखर द्वारा चांदनी को बताई गयी इस कथा में अंतिम पंक्ति
‘‘लगता है मेरी और तुम्हारी भाग्यरेखा एक जैसी है’’ ने मेरे मन मस्तिष्क में अनेक संभावना और आषंकाओं का सूत्रपात कर दिया। मैं इस पंक्ति में निहित अर्थ को ढूंढने का प्रयास कर ही रही थी कि जोगेन्द्रसिंहजी ने शेखर से कहा … ‘‘आप त सिद्ध पुरूष छावा किंतु म्यै तुमरो यो भाषा हब्रे निम्कि विंग छु। कृपया फेरी स्पष्टर विस्तार त भन्नुस!’’ अर्थात गुरूजी आप तो सिद्ध पुरूष हो लेकिन मैं आपकी ये भाषा नहीं समझता हूं। कृपया फिर से विस्तार से स्पष्ट करें।
उत्तर राघव भैय्या ने दिया … ‘‘दाज्यू यो मेरू यार राजस्थानी बैखु छन्, यो मारनु कम राघोड्नु जादे। राजस्थानी मा ओड़े आंखडा़े हुंदि क बाघ क चाल, बाज क नजर र राजस्थानी यार रा वचन प कभी शक नि करन।’’ अर्थात बड़े भाई ये मेरा मित्र राजस्थानी मानुष है जो मारता कम और रगड़ता ज़्यादा है। राजस्थानी में कहावत है कि शेर की चाल, बाज की नज़र और राजस्थानी यार के वचन पर कभी संदेह नहीं करना।
फिर घड़ी में समय देखते हुए राघव भैय्या ने व्यंगपूर्वक कहा … ‘‘देखो भई अब किसी काम में देरी के लियेे महिलाओं के नखरे के दोष के बजाए आज के घूमने के कार्यक्रम में इन महिलाओं की अंतर्राष्ट्रीय समस्या पर चर्चा के कारण देर हो चुकी है। शांम को लखवाड़ में मुखिया पानसिंहजी बिष्ट के शरद पूर्णिमा उत्सव में भी देर तक ठण्ड में बाहर ही रहना है। मौसम में मावठ की छींटा-छांटी से ठण्ड़क है और पता नहीं कब बारिष हो कर मुखिया पानसिंहजी की खुली जीप में मेरी प्रिय पत्नि इस हालत में भीग कर बीमार हो जाए, मैं अपने सर पर ये दोष कभी नहीं चाहूंगा।’’
राघव भैय्या के निर्णय से अंजली भाभी थोड़ा उदास हुई तो राघव भैय्या ने अपनी जेब से चिट्ठी निकाल कर बताते हुए कहा … ‘‘आज सुबह कैम्प में गांव से मां की चिट्ठी आई है और उन्होंने तुमको इस हालत में अपने पास बुलाया है। कमांडेंट साहब ने मुझे केवल दो दिन की छुट्टी दी है इसलिये कल दोपहर के भोजन के बाद कल बुआजी से मिल कर तुम्हें गांव छोड़ने के लिये जाना होगा। तुम्हारा इस हालत में तीन सौ पचास किलोमीटर की यात्रा करना …।’’
पता नहीं क्यों मेरे मुंह से निकला … ‘‘दाज्यू ठीक त कह छन भाभी!!’’ अर्थात दादा ठीक ही तो कह रहे हैं ना भाभी।
अंजली भाभी ने मेरी तरफ अर्थपूर्ण दृष्टि से देखते हुए बहुत धीरे से कहना चाहा … ‘‘लेकिन अंजली तुम …!!’’
शेखर ने मेरा समर्थन करते हुए कहा … ‘‘लेकिन वेकिन कुछ नहीं!! राघव ठीक ही तो कह रहा है। पहाड़ों में घूमना आप और सीप में पल रहे मोती से अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। हम सब यहीं पर …।’’
राघव भैय्या ने शेखर की बात काटते हुए कहा … ‘‘अरे नहीं यार नहीं, हमारे कारण तुम इस मौसम और इन पहाड़ों का अपमान मत करो। तुम लोग घूमने जाओ और हम दोनों पति-पत्नि को पृकृति प्रदत्त साथ रहने के इस अवसर का धन्यवाद प्रकट करने दो।’’
राघव भैय्या की बात पर हम सब हंस पड़े और ऐसे ही हंसते-हंसाते निर्णय हुआ कि मैं शेखर और चांदनी घूमने जाएंगे।
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