Zameer

Aawaz-e-Zameer

आवाज़-ए-ज़मीर

मंदाकिनी पार्ट 27 / MANDAKINI PART 27

चांदनी ने अपने गीत से ज़ीरो प्वाईंट से सेवॉय होटल तक के रास्ते आवासीय क्षेत्र शुरू होने तक की उस यात्रा को मेरी स्मृतियों की सर्वाधिक मूल्यवान पूंजी में संजो दिया था। मैं आज भी उन क्षणों को याद कर के रोमांचित हो उठती हूं। माल रोड़ पर होटल लायब्रेरी प्रेसिडेंसी से तिब्बती मार्केट का एक किलोमीटर का रास्ता शरदोत्वस की खरीददारी करने वालों और हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शों में पर्यटकों की अधिकता के कारण शेखर बहुत आहिस्ता-आहिस्ता गाड़ी चला रहे थे। मौसम खुला होने से सूरज की गुनगुनी धूप से गर्माहट लिये बहती हुई हवा में खाने-पीने की दुकानों से उठने वाली सुगंध में कभी सामिष तो कभी निरामिष गंध हमारे नथुनों से जा कर पेट में भूख की आग भड़का रही थी। नागेष परसारा ने कुछ खाने के लिये लेने का आग्रह किया तो चांदनी ने रात के खाने के लिये पेट खाली रखने की सलाह देते हुए मना कर दिया। थोड़ी ही देर में लालटिब्बा तिराहे से गुरूद्वारा साहिब पार कर के कार्निवल सिनेमा के सामने से आगे जा कर तिब्बती मार्केट पहुंचे। जहां थोड़ी देर रूक कर शेखर ने दो स्लीपिंग बैग और एक कष्मीरी शॉल लिया।
तिब्बत मार्केट से आधा किलोमीटर की दूरी पर बाईं ओर के तीव्र मोड़ पर घूमते हुए शेखर ने प्रस्ताव रखते हुए कहा … ‘‘वैसे तो तोप टिब्बा यहां से दो मिनट का रास्ता है लेकिन वहां से तोप टिब्बा षिखर पर जाने के लिये पैदल ही पहाड़ी पर चढ़ना होगा। दूसरा विकल्प ये है कि हम गाड़ी यहां कुलरी चौकी पर खड़ी कर दें और यहां से झूला हाउस से रोप-वे का आनंद लेते हुए सीधे तोप टिब्बा पहुंच जाएं। हालांकि पैदल चल कर पहुंचने में मेरा रोज का अभ्यास है तो मुझे इस पांच सौ मीटर के रास्ते में पांच मिनट लगेंगे, परसारा साहब को दस-बारह मिनट तो चांदनी को भी पन्द्रह मिनट लग सकते हैं लेकिन अरूणिमा को कम से कम आधा घंटा लगेगा। मौसम आंख-मिचोली खेल रहा है, सूरज को बादलों ने अपनी ओट में ले लिया है हो सकता है कि डूबते हुए सूरज के दर्षन हम सन सेट प्वाईंट से न कर सकें और तोप टिब्बा से ही उसे सलाम करना पड़े। रोप-वे से दस मिनट लगेंगे लेकिन रोप-वे की तुलना में पैदल जाना अधिक रोमांचक होगा आगे जिसकी जैसी श्रद्धा हो, अपना-अपना मत व्यक्त करें।’’
चांदनी में ना मालूम कौन सी उमंग उत्साह भर रही थी कि उसने शेखर के शब्दों को चुनौती की तरह ले कर पैदल चढ़ने का मानस बताया लेकिन मैं शारीरिक थकान की अपेक्षा शेखर से अपने मन की दो टूक बात नहीं कर पाने के कारण मानसिक क्षोभ से अधिक थकान अनुभव कर रही थी। इसलिये मैंने रोप-वे के विकल्प पर अपनी मंषा प्रकट की। मैंने रोप-वे जाने पर घाटी के सुंदर दृष्यों को देखने का तर्क रखा तो चांदनी ने मेरे तर्क को यह कह कर काट दिया कि वो दृष्य तो तोप टिब्बा पर पहुंच कर भी दिख जाएंगे।
मुझ में पैदल चलने का बिल्कुल साहस नहीं रह गया था तो मैंने खिन्न मन से तोप टिब्बा जाने का मना कर दिया तब शेखर ने समन्वय का मध्य मार्ग अपनाते हुए कहा … ‘‘हम अरूणिमा को भी निराष नहीं करेंगे और चांदनी की इच्छा का भी सम्मान रखेंगे।’’
नागेष परसारा ने संषय से पूछा … ‘‘यानी हम तीनों पैदल और अरूणिमा रोप-वे से …?’’
चांदनी ने नागेष परसारा का कथन पूरा होने से पहले ही व्यंगात्मक स्वर में उन्हें चिढ़ाते हुए कहा … ‘‘नहीं हम दोनों पैदल तोप टिब्बा पहुंचेंगे और अरूणिमा दीदी और हजूर रोप-वे से जाएंगे। देखते हैं लक्ष्य पर कौन पहले पहुंचता है?’’
बादल की खिड़की से सूरज ने एक क्षण के लिये झांका तो चांदनी के व्यंग में शेखर के साथ एकांत में बात करने का अवसर तलाष रही मुझे आषा की एक किरण दिखी। लेकिन अगले ही पल सूरज फिर बादलों में छिप गया और शेखर चांदनी की बात पर हंसते हुए बोले … ‘‘तुम लक्ष्य पाने की प्रतिस्पर्धा कर रही हो तो यह निष्चित है कि तुम्हारा लक्ष्य तुम्हारे बहुत समीप है लेकिन आज तो तुम हमारा उत्तरदायित्व हो, हमें अपना उत्तरदायित्व पूरा करने दो। आज पौराणिक और मध्यकालीन भारत के दो महान संत महर्षी वाल्मीकी और मीरा बाई की जंयती है। जिनके जीवन से हमें प्रेम, त्याग और समर्पण की सीख मिलती है। हम सब केबल कार से तोप टिब्बा चलेंगे और वापसी में पैदल आएंगे।’’
शेखर की बातों में एक बार फिर गूढ़ता को प्रतिबिंबित हुई थी लेकिन मैं उस गूढ़ता से अधिक अपने हाथ आने से रह गये अवसर के फिर से यूं निकल जाने से व्यथित थी और शेखर के समन्वयवादी निर्णय पर दिखावटी सहमती जताने के लिये विवष थी। केबल कार से तोप टिब्बा जाते हुए चांदनी बहुत उल्हासित हो कर मसूरी के दृष्यों की ओर संकेत करती हुई जगहों के नाम बता रही थी और मैं दोहरी मानसिकता में फंसी हुई चष्में के पीछे अपनी उदास आंखों में अपने लक्ष्य के समीप हो कर भी दूर होने का दर्द छिपा रही थी।
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झूला घर से तोप टिब्बा पहुंचने में केबल कार को दस मिनट भी नहीं लगे होंगे। चष्में से पीछे छिपे और दबे हुए दर्द को समेटे चांदनी के साथ मैं भी हुर्रे करते हुए तोप टिब्बा के झूला घर स्टेषन से बाहर निकली, सामने एक विषाल मैदान पर खाने-पीने की दुकनों पर पर्यटकों, प्रेमी युगलों और बच्चों की पसंदीदा बैटरी चालित खिलौना कारें मैंदान में जीवंतता का अनुभव करवा रही थी। तोप टिब्बा के पीछे कूछ दूर पहाड़ के बीच मे चट्टानों से निर्मित ऊंट की एक प्राकृतिक आकृती मानो कह रही थी कि हाथी पांव से चलता हुआ ऊंट पहाड़ के ऊपर आ गया है जिसे स्थानीय लोगों ने केमल बैक नाम दे दिया था। धीरे-धीरे खुल चुके मौसम में सूर्यदेव अपनी प्रकाष रष्मियों की गर्माहट से हमें उत्साहित करने का असफल प्रयास कर रहे थे क्योंकि हवा में घुली हुई ठंडक शांम घिर आने का संदेष मेरी और चांदनी के दुपट्टे के फरफर उड़ रही चुनरिया पे लिख रही थी। अस्ताचल को जा रहे आदित्य का तेज जैसे खिलती हुई चारूचंद्र की चांदनी की मनभावन छटा को देखने के लिये नहीं रूक पाने की विवषता से मलीन हो रहा था लेकिन साथ नवयौवना चांदनी की उमंगित भावनाओं का उजास उसके चेहरे पर खिल रहा था और सिंदूरी होती शांम की लालिमा चांदनी के अंतर्मन से उठ रही किसी यज्ञाग्नि की प्रदीप्त लौ से मिल कर उसके गालों पर दहकते अंगारों की चमक बन गयी थी।
शेखर एक दुकान में टेलीफोन करने गये तो नागेष परसारा भी उनके साथ चले गये। इस थोड़े से समय में प्रसन्नता के अतिरेक में चांदनी ने मेरे कांधे से अपना बायां हाथ गले तक लपेट कर दाहिने हाथ से मेरी चिबुक को छू कर मेरी आंखों में अपनी दृष्टी गड़ा कर देखते हुए कहा … ‘‘दीदी!! मैं आज बहुत ख़ुष हूं और इसका सारा श्रेय आप को जाता है लेकिन, मैं देख रही हूं अस्ताचल को जा रहे आदित्य के साथ उसकी अरूणिमा की रष्मियां भी …।
मैंने अपने मनोभावों पर पर्दा डालने का प्रयास करते हुए कहा … ‘‘अरे कुछ नहीं पगली, ये तो थकान से थोड़ा …।’’
चांदनी ने मेरी बात काटते हुए कहा … ‘‘रहने दो दीदी, आप से छोटी हूं लेकिन नासमझ नहीं हूं। शरीर की थकान और विरह विषाद के दंष का अंतर मैंने आप से अधिक देखा, भोगा और समझा है। आज पहली बार मुझे शेखर दा …।’’
चांदनी के शब्दों में मुझे पहली बार गम्भीर दृष्टा के साथ एक अच्छे विष्लेषक की अनुभूती हुई। लेकिन अधूरे रह गया अंतिम वाक्य मेरी आषंका का समाधान नहीं कर सका। पास आ चुके शेखर की आवाज़ ने उसे हठात चुप कर दिया जो कह रहे थे … ‘‘पहाड़ों की रानी षिव की प्रिय अलकों वाली मैनाकिनी में चांदनी और मंदाकिनी क्या योजना बना रही हैं।’’
नागेष परसारा का शेखर के साथ नहीं होने से अधिक शेखर के उद्बोधन में कल से आज तक पहली बार मंदाकिनी संबोधन ने मुझे अंदर तक सिहरा दिया। पर्थ फेल्ट केप और चष्में में छिपे हुए उनके मनोभावों का तो पता नहीं लगा लेकिन होंठों पर फैली मुस्कान उनकी प्रसन्नता व्यक्त कर रही थी जो संभवतर: उनके द्वारा टेलीफोन पर दिये गये गुप्त संदेश की सफलता का परिणाम था। चांदनी ने पुनः अपनी गम्भीरता का मुखौटा उतार कर अपने परिचित अंदाज़ में बहुत नटखट हो कर उलकी तरफ पलटते हुए कहा … ‘‘कुछ नहीं दाज्यू हजूर, अरूणिमा दीदी थक गयी है। कुछ गर्मागर्म चाय-कॉफ़ी और पकौड़े-षकौड़े हो जाएं तो …।’’
मेरी आंखें विस्मय से विस्फारित हो कर होंठों ने बुदबुबदाते हुए कहा … ‘‘दाज्यू? तुम तो शेखर को हजूर ऐसे कहती रही हो जैसे …।’’
चांदनी ने मुझे आष्चर्य का दूसरा झटका देते हुए कहा … ‘‘अरे दीदी वो तो मैं नागेष को भड़काने और विचलित करने के लिये अभिनय कर रही थी।’’
एक ही पल में दूसरी बार मुझे लगा किसी ने मेरे पांवों का सारा लहू निचौड़ लिया हो और हृदय की गति भी बहुत कम हो गयी तो शरीर लहराने लगा। मैं गिर ही पड़ती कि शेखर ने मुझे अपनी बाहों में संभालते हुए धीरे से कहा … ‘‘क्या हुआ मंदाकिनी, तुम ठीक तो हो?’’
मैंने सुना, चांदनी शेखर से कह रही थी … ‘‘कुछ नहीं दाज्यू, कभी-कभी भ्रम के साथ शरीर भी इसी तरह टूट जाता है। अप्रत्याषित दुख इतना कष्टदायी नहीं होता जितना अविष्वसनीय प्रसन्नता। मन समझ ही नहीं पाता कि किस प्रकार प्रतिक्रिया दे और तब हृदय भ्रमित हो कर अपने धड़कने की गति असाधारण रूप से बदल लेता है।’’
किसी अनिष्ट की आषंका में कुछ लोग हमारे पास आ कर ‘क्या हुआ’, ‘क्या हुआ’ पूछने लगे तो चांदनी ने नहीं मालूम उन्हें क्या कहा लेकिन शेखर मुझे सहारा देते हुए उस रेस्टोंरेंट की तरफ बढ़ चले जहां नागेष परसारा हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। चांदनी मेरे बायीं ओर थी तथा दाहिनी तरफ शेखर ने मेरा हाथ पकड़ा हुआ था मैं उनकी तरफ कृतज्ञता से देखती हुई चल रही थी और वो मेरी तरफ देखते हुए कह रहे थे … ‘‘मंदाकिनी, तुमने चांदनी द्वारा मेरे प्रति किये गये ‘हजूर’ संबोधन के ना मालूम क्या अर्थ लगा लिये। मेरे प्रति तुम्हारी भावना ने तुम्हारी सोच को कुंठित कर दिया और अपनी ही भाषा और संस्कृती को भूल गयी कि गढ़वाली, कुमाऊंनी और नेपाली में ‘दाज्यू’ का अर्थ बड़ा भाई होता है। अतिषय सम्मान में पिता और बड़े भाई को ‘बाबा हजूर’ और ‘दाज्यू हजूर’ कहने की परंपरा बिल्कुल राजस्थानी जैसी है जहां पिता को ‘दाता हुकम’ और ‘दादा भाई’ और बातचीत में सहमती के लिये केवल ‘जो हुकम’ या ‘होकम’ बोलते हैं। भारतीय सांस्कृति परंपराओं के विरोधी वामपंथी विचारक इन शब्दों को सामंतवात का अवषेष बता कर आलोचना करते हैं किंतु ये शब्द पारिवार में बड़ों के प्रति सम्मान, सामाजिक स्तर पर संबंधों की उच्च गरिमा व प्रतिष्ठा और एक युगीन सभ्यता की धरोहर है। मैं देख रहा हूं कि चांदनी को ले कर तुम सुबह से ही अनमनी हो रही हो।’’
मेरी आंखों में दिन भर का घटनाक्रम घूमने लगा और मैं शेखर की तरफ मंत्रमुग्ध से देखती रह गयी। सारा परिदृष्य उलटा होने लगा, हम उस रेस्टोंरेंट के पास पहुंच रहे थे जहां नागेष परसारा हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। तब शेखर ने मेरा हाथ छोड़ कर मेरे गालों पर हल्के से थपथपाते हुए कहा … ‘‘अरे बावली, जो तुम मुझे लेकर चांदनी के बारे में कहना चाह रही हो वो मैं सोच भी नहीं सकता। मेरे लिये प्रेम, प्रणय और परिणय … ।’’
मैं उत्साह के अतिरेक में उस पल को, मेरे मन में दृढ़ हो चुके ‘दो टूक’ बात करने का सर्वाधिक उपयुक्त अवसर समझा। मैं एक बार फिर भूल गयी कि नियती के समक्ष हम सब विवष हैं और शेखर की बात पूरी होने की प्रतीक्षा किये बिना अधीरतावष निर्लज हो करकहना चाहा … ‘‘षेखर मैं तुम से …।’’
लेकिन मेरी बात पूरी होने से पहले ही रेस्टोंरेंट से आ रहे नागेष परसारा ने चिंतित स्वर में पूछा … ‘‘इतनी देर कहां लगा दी शेखर साहब? किन नज़ारों में खो कर रह गये? अंदर कुछ लोग बात कर रहे थे कि बाहर किसी अरूणिमा की …।’’
चांदनी ने फिर अवसर को लपकते हुए नागेष परसारा को लगभग चुप कराते हुए कहा … ‘‘तबीयत तो नहीं, मन खराब हो गया था। अब बिल्कुल ठीक है।’’
फिर मेरी तरफ चंचलता से अपनी आंखें डबडबा कर देखते हुए बोली … ‘‘क्यों दीदी, अब तो ठीक हो ना?’’
मैं चांदनी की तरफ प्रेम, लज्जा और कृतज्ञता मिश्रित मुस्कुराहट से देखते हुए धीरे से सर हिला कर हां कहने के अतिरिक्त क्या कर सकती थी।
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मन हल्का हो जाने के परिणामस्वरूप जंगल सामग्री से बने हुए रेस्टोंरेंट में कल्पनाषीलता के अद्भुत प्रयोग देख कर मेरे कलाकार हृदय का स्पंदन एक बार फिर से गतिमान हो चुका था। मैं वहां की साज-सज्जा देख कर अभिभूत थी। प्रवेषद्वार से घुसते ही सामने कैम्पटी फॉल्स की कृत्रिम प्रतिकृती बरबस ही हमें वहां तक खींच कर ले गयी। बांस-बल्लियों पर वाटरप्रूफ तिरपाल डालकर बनी हुई पहाड़ की आकृति को एक्रेलिक रंगों से पहाड़ों का रंग दिया हुआ था और नीचे हौज में भरा हुआ पानी बिजली की मोटर से पांच छोटी-बड़ी धाराओं में कैम्पटी फॉल्स का आभास करवा रही थी। लकड़ी से बने बड़े हॉल में पेड़ों के मोटे लट्ठों को तराष कर बनायी गयी कुर्सियों के बीच में वैसे ही मोटे लट्ठों को अपने प्राकृतिक आकार में मेज के रूप में रखा हुआ था जिन पर रखी हुई पतली-मोटी जड़ों की सुंदर कलाकृतियों से छन कर आ रही हल्की पीली रोषनी एक अलग ही अनुभूती दे रही थी। सजा कर रखे गये खोखले पेड़ों के नक्काषीदार लट्ठों में छिपे हुए गमलों में फूलों के पौधे, एक सूखे पेड़ की टहनियों में लटके हुए बया के घोंसलों में अलग-अलग तरीके से सजी हुई कृत्रिम बया और उन घौंसलों में छिपे हुए छोटे-छोटे स्पीकर्स से आती हुई चिड़ियों की आवाज़ के साथ प्रेमी युगल के बिछड़ने के दर्द की मौन उलझन और उदासी व दुष्वारियों की घटाओं के बीच मिलन की तड़प व उत्कंठा को प्रतिध्वनित करतीे राग पहाड़ी की खनक मिश्रित राग पीलू के स्वर बांसुरी पर बज रहे थे।
सब ने अपनी-अपनी पसंद का ऑर्ड़र कर दिया तब मैंने सहज होने का प्रयास करते हुए हम चारों के मध्य आ गयी संवाद शून्यता को गतिमान किया और चांदनी को संबोधित करते हुए कहा … ‘‘बड़ी देर से सुन रहे थे तोप टिब्बा, तोप टिब्बा, तोप टिब्बा!! कहां है तोप कहां है टिब्बा?’’
नागेष परसारा ने पहली बार चांदनी और शेखर को सीधे इंगित करते हुए कहा … ‘‘ये तो मसूरी के मूल निवासी और भूगोलषास्त्री बताएं या इतिहासकार शेखर साहब?’’
चांदनी ने नागेष परसारा के उससे इस पहले सीधे चुनौतीपूर्ण उद्बोधन को स्वीकारते हुए उसी स्वर में कहा … ‘‘ये हमारी मसूरी है साहब, लोग इसे पहाड़ों की रानी कहते हैं लेकिन ये पहाड़ों की रानी और मसूरी तो बहुत आधुनिक नाम है जिसे सब जानते हैं। इस जगह का वास्तविक नाम पर्वतराज हिमालय की पत्नि मैनाकिनी, मलिंगार और गंधमादन पर्वत है। इस पौराणिक महत्व के पहाड़ों की श्रंखला का नाम मसूरी होने से पहले इन पहाड़ों में बसे गांवों को क्यार कली, भट्टा गांव, तुनेठा, कोईरी, धण्डियाला, रिखोली, कसूरी, चामासारी, मसरास पट्टी आदि नामों से जाना जाता था। इनके अतिरिक्त कुमायत्री, कालनी, बिजोगी, सितारों की टोंगरी, संतरावाडी, झुरापानी, हाथीपांव, बाटाघाट, सुवाखोली, भदराज, दुधली, कोलनी और बिनोग भी पुराने नाम है। 1925 तक के सरकारी पत्रों में टिहरी नरेष को किंग ऑफ गढ़वाल कन्ट्री का संबोधन इस बात का प्रमाण है कि महाभारत काल से इस आधुनिक समय तक इस क्षेत्र को एक अलग देष का दर्जा प्राप्त था। इस क्षेत्र का गढ़वाल नाम होने की दो थ्योरी हैं। पहला यह कि इस पूरे पर्वतीय प्रदेष में बावन गढ़ होते थे जिसके कारण इसे गढ़वाल कहा जाता है। दूसरी यह कि वैदिक संस्कृत में गड् का अर्थ छोटी नदी और गाड़ का अर्थ बड़ी नदी होने से यह क्षेत्र वैदिक संस्कृती का उपस्थान है और अनेक छोटी-बड़ नदियों वाला क्षेत्र होने से इसे गड़वाल कहा जाता है।’’
चांदनी ने बहुत आत्मविष्वास से पानी का एक घूंट पी कर हमारे चेहरों पर अपने भाषण का प्रभाव पढ़ने के बाद कहना जारी रखा … ‘‘रामायण के महत्वपूर्ण पात्र परषूराम सहित उनके षिष्य महाभारत के विषिष्ठ पात्र गुरू द्रोण और उनके पाण्ड़वों के अज्ञातवास का इन पहाड़ों से गहरा संबंध है। बिनोग टिब्बे पर जिस गुफा की आप बात कर रहे थे, संभव है ये वो ही गुफा हो लेकिन वो अभी तक देखी नहीं गयी है। यहां का भदराज मंदिर श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम द्वारा बनवाया जाना बताया जाता है। उन्नीसवीं सदी के आरंभ में यहां की पवित्रता नष्ट होनी आरंभ हुई जब अंग्रेज यहां आये और लंढ़ोर में अपने रहने के लिये मकान, अपने अतीथियों व अधिकारियों के लिये विश्रामगृह के नाम पर ऐषगाह बनाना शुरू किया। आज जिसे हम लंढ़ोर कहते हैं, पुराने समय में यहां से सेलाकुई, कालसी और भदराज होते हुए एक पगडंडी आगे गंगोत्री व हिमालय में जाती थी। ये वो पहाड़ियां है जहां पांडवों के सषरीर स्वर्ग प्रस्थान के समय द्रौपदी लुढ़क कर गिर पड़ी थी और इस क्षेत्र को लुढ़ोर टिब्बा संज्ञा से जाना जाता रहा जो समुद्रतल से साढ़े सात हजार फिट ऊंचा है। लेकिन अंग्रेजों ने इसे अपनी भूमी कहते हुए ‘लैंड़ ऑवर’ कहा जाने लगा जो उच्चारण की भिन्नता के कारण कालांतर में लंढ़ोर हो गया। इसी लुढ़ोर के लाल टिब्बे से हिमालय की नन्दादेवी, चौखम्बा, श्रीकंठ, बंदरपुंछ, केदारकांठा, त्रिषूल और सुरकंडा देवी नामक प्रमुख षिखरोें को देखा जा सकता है।’’
किसी क्लास टीचर की तरह इतने विस्तृत इतिहास को संक्षिप्त में बता रही चांदनी की भावभंगिमा से मैं बहुत सहज हो चुकी थी। हमारे द्वारा ऑर्ड़र किया गया खाने-पीने का सामान परिचारक मेज पर रख रहे थे। उस समय चांदनी ने विराम लिया तो मुझे अवसर मिल गया और मैंने अपनी संकोच ग्रंथी को खुलता हुआ अनुभव किया तो चांदनी को छेड़ते हुए पूछा … ‘‘तुम पहले से विख्यात बातों को दोहरा कर ख्याती प्राप्त करने का प्रयास कर रही हो। तुम्हारे इस व्याख्यान में तोप और तोप टिब्बे का मेरा प्रष्न अभी अनुत्तरित है।’’
मैंने चांदनी पर सीधे प्रहार किया था लेकिन चांदनी ने उस प्रहार से प्रभावित हुए बिना अपना व्याख्यान जारी रखा … ‘‘लुढ़ोर टिब्बे के जिस सात हजार फिट ऊंचे भाग पर हम बैठे हैं ये विषाल मैदान ही बीते हुए कल का तोप टिब्बा है जो आज पानी का विषाल टैंक हो कर मसूरी के वाषिंदों को जल आपूर्ति करता है। सन 1855-56 में यहां पष्चिमी बंगाल के कोसीपोर में ब्रिटिषर्स की तोप एवं आयुध निर्माण फैक्ट्री में निर्मित एक तोप स्थापित की गयी थी जो प्रतिदिन दोपहर बारह बजे चलाई जाती थी और जिसका उद्देष्य घाटी में बसते जा रहे शहर में अंग्रेजों द्वारा स्थापित घंटाघरों और सैन्य छावणियों सहित सभी लोगों द्वारा अपनी-अपनी घड़ियों में समय को एकरूप देना होता था। लगभग सत्तर वर्ष तक वो तोप गरजती रही लेकिन तोप की भयंकर गर्जना से पहाडों के पारिस्थितिक तंत्र पर विपरीत प्रभाव, गर्भिणी वन्यजीव मादाओं पर दुष्प्रभाव और सुविधा से अधिक यहां रह रहे संभ्रात अंग्रेजों की शांती भंग होने के कारण 1919-20 में वह तोप हटा दी गयी। रह गया बस नाम ‘तोप टिब्बा’ जहां आज न तोप है न टिब्बा है। कहानी खतम पैसा हजम।’’
इतना कह कर चांदनी ने जान बूझकर अपनी चाय का बहुत आवाज़ के साथ सुड़का लेते हुए अपनी भवों को दो बार ऊंचा-नीचा किया तो मैंने उसे प्रषंसापूर्वक देखते हुए कहा … ‘‘चांदनी!! मैनें तुम्हें एक सीधी सादी अल्हड़ पहाड़न युवती समझा और तुम इतनी …।’’
चांदनी ना मालूम क्यों और कैसे पलभर में शांत, गम्भीर तथा परिपक्व और दूसरे ही पल एक बच्चे की तरह चंचल व्यवहार कर रही थी। मेरी बात पूरी होने से पहले ही पुनः गम्भीर हो कर दार्षनिक भाव से बोली … ‘‘नदियों की कलकल और समंदर की लहरों का शोर रात की नीरवता में रूदन बन जाता है दीदी। इसलिये जो दिख रहा है उसे भेददृष्टी से देखने पर ही पता लगता है कि जो दिख रहा है वो है नहीं और जो है, वो दिख नहीं रहा। और जो देख कर भी अनदेखा करे तो …।’’
संभवतः पहली बार नागेष परसारा ने चांदनी की बात उपेक्षापूर्वक काटते हुए शेखर को संबोधित कर कहा … ‘‘षेखर साहब, पढ़े और पढ़ाये गये दृष्टव्य इतिहास में क्या आप की भेददृष्टी किसी अदृष्ट तथ्य को देख पा रही है? और क्या यहां अदृष्ट हो चुके तोप व टिब्बे के अतिरिक्त कुछ और देखने योग्य है?’’
शेखर ने चांदनी के व्याख्यान पर अपना मौन तोड़ते हुए कहा … ‘‘केवल इतना ही कि आलोचना एक मानवीय स्वभाव है किंतु निरपेक्ष भाव से देखें तो मानव समाज की इकाई के प्रत्येक समूह में गुण व दोष एक नैसर्गिक व्यवस्था है। हम केवल अपने परिवेष के प्रभाव में अपने धर्म, दर्षन, इतिहास और संस्कृती को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। इस सूत्र को अपनाते हुए अदृष्ट में दृष्टव्य यह है कि कुछ इस्लामिक कट्टरपंथियों के कारण पूरा मुस्लिम समुदाय आज कटघरे में है लेकिन जिस तरह इस्लाम में अच्छाईयों की कमी नहीं है उसी तरह ब्रिटिषर्स में भी ढूंढ़ने पर वो अच्छी बातें मिलती हैं जो भारतीय सामाजिक ताने-बाने में किसी समय एक अंधेरे की तरह अंकित हो गयी थी। जैसे श्रमिकों व किसानों से बेगार प्रथा का उन्मूलन किया जा कर कार्य दक्षता व क्षमता अनुरूप उनके पारश्रमिक को निष्चित किये जाने वाला कानून बनाया जाना। इसी प्रकार भूमि पर अनाधिकृत अधिकार को नियंत्रित करने के लिये भूमि अधिकार संरक्षण कानून बनाया जाना भी ब्रिटिषर्स के खाते में ही जाता है। खेद का विषय है कि 1947 के बाद देष में लोकतंत्र के नाम पर भीड़ के रूप में राजनैतिक संरक्षण प्राप्त गुंड़े-बदमाषों ने सरकारी भूमि पर अपने-अपने साम्राज्य स्थापित कर लिये है और सत्ता के दलाल वोटों के लालच में चुपचाप तमाषा देखते रहते हैं।’’
शेखर ने अपना कथन जारी रखते हुए कहा … ‘‘अब बात रह जाती है कि तोप टिब्बे पर तोप और टिब्बे की अनुपस्थिती में यहां और क्या देखने लायक है तो यहां मां अम्बा का एक प्राचीन मंदिर है, नीचे उतरते समय सुरकंड़ा देवी का मंदिर भी लोगों की आस्था का केन्द्र है और सृष्टी के न्यायाधिपति शनिदेव का नवनिर्मित मंदिर है। आज शनिवार भी है तो …।’’
शेखर ने जान बूझकर अपना वाक्य पूरा नहीं किया और एक प्रकार से आंकलन करते हुए हमारी रूचि के बारे में जानने का प्रयास किया। नागेश परसारा ने लगभग हम तीनों का प्रतिनिधित्व करते हुए मंदिरों में रूचि नहीं होना बताते हुए कहा … ‘‘मुझे शनिदेव के दर्षन में कोई रूचि नहीं है, उसके मूल में मेरे अपने तार्किक और वैज्ञानिक कारण हैं। उन्हें मेरी भूल का जो दंड देना है वो दे लें। वैसे भी उनके न्याय में किसी के लिये दया और क्षमा का कोई स्थान नहीं है और बिनोग टिब्बे पर मां ज्वालाजी के दर्षन में नवदुर्गा के दर्षन हो चुके। अब आज के पंचाग अनुसार सूर्यास्त का समय हो गया है। यदि हम चाहें भी तो सन सेट प्वाईंट तक नहीं पहुंच सकेंगे। हां यहां से भी डूबते हुए सूरज के बहुत अच्छे दृष्य देख सकते हैं।’’
चांदनी ने तुनक कर कहा … ‘‘मुझे नहीं देखना डूबता हुआ सूरज!! सूरज का डूबना मुझे अच्छा नहीं लगता।’’
मुझे बाबूजी की कही हुई बात याद आ गयी और मैंने ना मालूम किस प्रवाह में चांदनी को समझाते वो ही शब्द दोहरा दिये … ‘‘षांत हो जाओ चांदनी! शांत हो जाओ! चांदनी का जलना भी अच्छा नहीं होता। तुम तो भूगोलषास्त्री हो, क्या तुम ये बात नहीं जानती कि सूरज कभी डूबता नहीं है। वो तो नित्य निरंतर कहीं उदय होता रहता है। पृथ्वी के इस भाग में सूर्य का अस्त होते हुए दिखना केवल हमारे क्षितिज की लघुता और संकीर्णता है। हमारे क्षितिज के इस छोर पर हमारे भाग्य में सूर्य का केवल इतना ही प्रकाष लिखा है जितना हम शांम तक देख पाएंगे और तब सूर्य का रथ क्षितिज के दूसरे छोर पर अपना प्रकाष दे रहा होगा। कल का सूरज तुम्हारे लिये एक नये उत्साह और उमंग की अरूणिमा ले कर आयेगा। शांत हो जाओ।’’
चांदनी ने मुझे निरूत्तर करते हुए कहा … ‘‘लेकिन चांद क्या करे? उसकी चांदनी सूरज की प्रकाष रष्मियों का परावर्तन मात्र ही तो है। क्या चांद इसीलिये अपने हिस्से का प्रकाष पाने के लिये सूरज का पीछा करते हुए धरती के इस छोर से उस छोर तक घूमता है?’’
मैंने निसहाय भाव से शेखर की तरफ देखा और कहा … ‘‘षेखर, अब तुम ही इस बावली को समझाओ।’’
शेखर ने चांदनी को उसी के विषय को नागेष परसारा के शब्दों में लपेट कर कहा … ‘‘भूगोल अंतरिक्ष विज्ञान का एक छोटा सा भाग है चांदनी!! और विज्ञान तर्क से चलता है वहां भावनाओं का कोई स्थान नहीं है। तुमने ही तो कहा कि जो दिख रहा है उसे भेददृष्टी से देखने पर ही पता लगता है कि जो दिख रहा है वो है नहीं और जो है, वो दिख नहीं रहा। अर्थात चांदनी का सूरज का प्रकाष परावर्तन समझना भी दृष्टीभेद या दृष्टीदोष के कारण है। क्या धूल सने दर्पण से प्रकाष परावर्तित हो सकता है?’’
चांदनी ने शांत हो कर शेखर से सहमती जताते हुए धीरे से कहा … ‘‘नहीं।’’
शेखर ने अपनी बात को विस्तार देते हुए आगे कहा … ‘‘तो फिर फूलों में पराग, अग्नि में ताप, वायु में शीतलता, गुड़ में मिठास की तरह चांद में चांदनी भी उसका अदृष्ट गुण है जो दृष्टी में किसी चक्षुतिमरी दोष वाले के लिये तब तक अदृष्ट है जब तक वह अपनी दृष्टी में दोष न देख ले फिर वो चाहे कोई उच्च कुलीन राजा भोज हो या विद्वान हो कर भी आजीविका के लिये नीच कर्म करने वाला चोर।’’
चांदनी की बातों और व्यवहार से आहत शांत बैठे नागेष परसारा को शेखर के स्पष्टीकरण ने उद्वेलित किया और वो बोले … ‘‘षेखर साहब, लगता है कि अभ्यास ने हर बात को रहस्यपूर्ण बना देना आपकी आदत बना दिया है। अब दृष्टीभेद में ये राजा भोज और चोर का क्या संदर्भ है?’’
शेखर ने अपने स्वभाव अनुसार एक रहस्यपूर्ण शर्त रखते हुए कहा … ‘‘एक शर्त है कि सूर्यास्त होने को है तो चांदनी सुर्यास्त देखेगी और परसारा साहब को यहां से लौटते समय रास्ते में शनिदेव पर अपनी विज्ञान आधारित तार्किक असहमती के अतिरिक्त आज शरदोत्सव में चंद्रमा के दर्पण में सूरज के परावर्तित प्रकाष पर कोई कविता सुनानी पड़ेगी।’’
चांदनी और नागेष परसारा के मुंह से पहली बार उत्कंठित हो कर एक ही स्वर में आवाज़ आयी … ‘‘अर्थात चांदनी पर?’’
शेखर मुस्कुरा कर बोले … ‘‘हां भाई हां! च्ंाद्रमा के दर्पण में सूरज के परावर्तित प्रकाष का मतलब चांदनी ही होता है।’’
चांदनी तो सूर्यास्त दर्षन के लिये एकदम सहमत हो गयी लेकिन नागेष परसारा ने सकुचाते और ना नुकर करते हुए हां भर ली तो शेखर ने राजा भोज और चोर के दृष्टी भेद की कहानी सुनाई … ‘‘षरदोत्सव के उल्हास से थकित रानी वसंतसेना सो चुकी थी किंतु राजा भोज को शरद पूर्णिमा के चंद्रमा की शीतल चांदनी भी जला रही थी। मन की इसी तपिष के चलते अपने शयनकक्ष के झरोखे से आकाश में स्थित चन्द्रमा देखते हुए राजा भोज ने एक श्लोक कहा-
यदेतइन्द्रान्तर्जलदलवलीलां प्रकुरुते।
तदाचष्टे लोकः शशक इति नो सां प्रति यथा।।
अर्थात् – चाँद के भीतर जो यह बादल का टुकड़ा सा दिखाई देता है लोग उसे शशक (खरगोश) कहते हैं। परन्तु मैं ऐसा नहीं समझता।
राजा भोज इसके आगे अपने मनोभाव को व्यक्त नहीं कर पा रहे थे और बार-बार इसी अधूरे श्लोक को दोहरा रहे थे। संयोग से प्रारब्ध अधीन चोर कर्म से अपने परिवार का पालन करने वाला महल में घुसा हुआ एक विद्वान् राजा के सो जानेे की प्रतीक्षा कर रहा था। जब राजा भोज बहुत देर तक उस श्लोक का उतरार्द्ध पूरा न कर सके और अधुरे श्लोक को दोहराते रहे तो उस चोर से चुप न रहा गया और उसने उस श्लोक की पूर्ति इस प्रकार कर दी-
अहं त्विन्दु मन्ये त्वरिविरहाक्रान्ततरुणो,
कटाक्षोल्कापातव्रणशतकलङ्काङ्किततनुम्।।
अर्थात् – मैं तो समझता हूं कि तुम्हारे शत्रुओं की विरहिणी स्त्रियों के कटाक्ष रूपी उल्काओं के पड़ने से चन्द्रमा के शरीर में सैकड़ों घाव हो गए हैं और ये उसी के दाग़ हैं।
अपने पकड़े जाने की परवाह न करने वाले उस विद्वान चोर के चमत्कार पूर्ण कथन को सुनकर भोज बहुत खुश हुये और उस समय विद्वता की पूछ परख ज्यादा थी सो अगले दिन प्रातः उसे भारी पुरस्कार देकर विदा किया गया।’’
इतना कह कर शेखर कुछ क्षण मौन हो कर हम तीनों के चेहरे पढ़ने लगे। नागेष परसारा और चांदरनी का तो मुझे पता नहीं, उस समय मैं यह भी नहीं जान पायी कि उन के मन में क्या चल रहा है लेकिन मैं सोच रही थी कि शेखर किसी निष्चित लक्ष्य की ओर हमारी सोच को धकेल रहे थे। बहुत संभव था कि नागेष परसारा और चांदनी भी यही सोच रहे हों। इसी असमंजसता की स्थिती में उन्होंने चुटकी बजा कर हम तीनों को वर्तमान में लाते हुए कहा … ‘‘तो, चलें? मैं समझता हूं कि सूरज को क्षितिज के उस पार उदय होते देखने का समय हो गया है।’’
नागेष परसारा ने बिल का भुगतान किया और हम सूर्यास्त दर्षन के लिये रेस्टोंरेंट प्रबंधक द्वारा पहले से चिन्हित स्थान पर पहुंचे। घाटी में ध्वज की तरह खड़े देवदार के पेडों से छन कर घरों से उठते हुए चूल्हों के धुआं के साथ बादलों के उतरते घूंघट में अपनी ऊषा के माथे पर चमकती हुई बड़ी सुहाग बिंदी की तरह धीरे-धीरे नीचे उतरता सूरज और सिंदूरी होते क्षितिज पर घौंसलों की तरफ लौट रहे पंक्तिबद्ध परिंदों की टोलियां मेरे आल्हादित हृदय में अद्भुत हिलोरें भर रहे थे। शेखर और चांदनी को ले कर भ्रम के कारण उत्पन्न विषाद अग्नि से मेरा मन कल रात से अब तक बहुत तप चुका था जो अब ठण्ड़ी-ठण्ड़ी हवा के झौंकों से मेरे उड़ते हुए आंचल की तरह मस्ती से लहरा रहा था। उस ऊंचाई से चारों तरफ देखते हुए आईटीबीपी के एडमिस्ट्रिेटिव ब्लॉक, उससे ऊपर कॉम्बेट विंग व बौद्ध सभ्यता की गाथा कहता तिब्बती मंदिर, वहीं कार्ट मैंकेंजी रोड़ पर नाग मंदिर, नीचे कुलनी बाज़ार से कैमल बैक रोड़ पर पैदल और घोड़ों पर सवारी करते पर्यटक और दूर तक फैली हुई पहाड़ियों में झरने व झीलें अचानक अच्छे लगने लगे।
शांम का धुंधलका घिर आने से पहले हम तोप टिब्बे से नीचे आने लगे। इन बत्तीस वर्षों में तो मसूरी का बहुत विकास हो गया, उन दिनों तोप टिब्बे का रास्ता बारिष से थोड़ा फिसलन भरा होने के कारण बहुत संभल कर चलना पड़ रहा था। किसी स्थान से मसूरी का मनोरम दृष्य देखने का मन होता भी तो घिरती आ रही शांम के कारण हमें कुलरी पहुंच कर लखवाड़ जाने की जल्दी थी। कुलरी पहुंचने से थोड़ा ही पहले सुरकंड़ा देवी मंदिर में आरती अपने अंतिम पड़ाव पर थी, भीड़ के कारण बाहर से ही प्रणाम कर हम अपनी गाड़ी तक पहुंचे और व्हिस्पिरिंग टोरेंट कैंम्पिंग रिसॉर्ट की तरफ बढ़ चले।
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