मंदाकिनी पार्ट 8 / Mandakini part 8

प्रस्तुत करते हुए उन मित्रों को टेग करना चाहता हूं जिन्होंने चींटियों को ‘कीडी नगरा’ डालने की विधि जानने की जिज्ञासा प्रकट की है।
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मीना ने शेखर को अपने शब्दकुम्भ में उतार लिया था और शेखर के पास कोई उपाय नहीं था। बडे टूटे मन से कहा … ‘‘चलिये, भूले से गाय खाई, अब खाएं तो राम दुहाई, लेकिन ये तो वनक्षेत्र है ना? हम हन्हें यहां ही छोड देते हैं। दीमक के पास ये अपने आप चले जाएंगे।’’
यह निष्चय हो जाने पर मीना ने थैले को पकडा और शेखर ने एक एक कर दोनों पेंगोलिन को थैले से निकाल कर भूमि पर रखा और मीना से कहा कि वह हाथ जोडकर दोनों को प्रस्थान करने का निवेदन करे। मीना का डर समाप्त हो चुका था तो उसने एक पेंगोलिन को छू कर देखना चाहा और यहीं गलती हो गयी। पेंगोलिन अपने मूल आकार में तेजी से आया तो शेखर ने मीना का हाथ तेजी से खींच कर हटाया लेकिन स्वयं को पेंगोलिन की तेजी से खुलने वाली पूंछ के रेंज से नहीं बचा सके और उनके बाएं हाथ में पेंगोलिन के शल्कों से गहरा कटाव आ गया।
मीना भौचक्की रह गयी थी और शे और हम सब भी एक बार के लिये घबरा गये लेकिन शेखर ने हंसते हुए कहा … ‘‘ये बंधन से मुक्ति की पीडा है जो पुनः बंधन में बंधना चाहती है।’’
मीना ने रूआंसा होते हुए कहा ‘‘लेकिन मेरे पास तो बांधने के लिये कुछ भी नहीं है।’’
शेखर ने मीना की आंखों में देखते हुए कहा … ‘‘लेकिन ज़ख़्म इतने गहरे भी नहीं कि सीने के लिये आंसुओं के धागे व्यर्थ किये जाएं।’’
मैंने अपनी एक मात्र चुन्नी से घाव पर पट्टी बांधते हुए कहा … ‘‘ आप गम्भीर परिस्थिति में भी गम्भीर नहीं होते लेकिन वैसे आप बहुत गम्भीर और समझ में नहीं आने वाले हैं। बारिषों का मौसम है, साधारण घाव को गम्भीर होने में क्या देर लगती है।’’
मीना ने मेरी तरफ कृतज्ञता के भाव से देखा और बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह दिया। सरकती जा रही घडी की सूईयों के साथ खाना खाते हुए राघव भैय्या और अंजली भाभी ने आगे की योजना पर बातें की, डाॅली और राहुल तो शेखर अंकल से ये सवाल और वो सवाल करते रहे। मीना और मैं फोटोग्राफी के स्थान चिन्हित करने के बहाने एक तरफ आ गये तो मीना ने मुझसे पूछा कि मैंने शेखर से स्पष्ट बात की या नहीं? मैंने निराषा से नकारात्मक उत्तर दिया तो मीना में राॅबर्स केव में मिलने वाले संभावित अवसर को नहीं चूकने की हिदायत दी।
फोटोग्राफी के बाद एक बार पुनः विलीज़ टपकेष्वर से राॅबर्स केव के रास्तों पर चल पडी। ना नुकर के बाद इस बार ड्राइव राघव भैया कर रहे थे शेखर आगे की सीट पर बैठे थे।
थोडी देर बाद सब सामान्य हुआ तो अंजली भाभी ने बात छेडी … ‘‘षेखर भैया, अब तो कोई व्यवधान नहीं है, वो कीडी नगरे वाली बात अब तो बता दो।’’
डाॅली और राहुल बिलबिला पडे … ‘‘हां हां अंकल, बताओ ना बताओ बताओ।’’
शेखर ने आधा दाहिने घुम कर पीछे देखते हुए कहा … ‘‘अरे हां भाभी वो कोई लंबी चौडी बात नहीं है। बस, किसी ने कच्ची सलेट पर लिख दिया तो कीडियों के घर तक दया भाव से पहुंचाया जाने वाला खाना ही आज कीडी नगरे के नाम से स्थापित हो गया। जबकि जिस स्थान पर कीडियां यानी चींटियां होती है उस जगह को खोदा जाए तो नगर के रूप में बसी हुई पूरी एक दुनिया के दर्षन होंगे। जहां उनके खाने के भण्डार अलग, अण्डों की जगह अलग, श्रमिक चींटियों के घर अलग, रानी चींटी का घर अलग।‘‘
‘‘अब ये शोध का विषय है कि पुण्य कमाने के लिये धार्मिक भावना से चींटियों के लिये प्रारंभ किया अन्नदान कब कीडी नगरा की संज्ञा से चलन में आया। लेकिन पुण्य कमाने के फेर में हम पाप अर्जित कर रहे हैं ये कोई नहीं समझ पा रहा।’’
अंजली भाभी सहित हम सभी का दृष्टिविस्तार के साथ दृष्टिकोण भी बदलने लगा था। नेतृत्व संभाले अंजली भाभी ने कहा … ‘‘कीडी नगर और अन्नदान का कीडी नगरा बन जाना समझ में आ गया किंतु चींटियों को अन्नदान कर के पुण्य के स्थान पर पाप अर्जित करने की बात समझ में नहीं आई।’’
शेखर ने स्पष्ट करते हुए समझा कर कहा … ‘‘वो ऐसे कि चींटियों को अन्नदान के नाम पर डाला जाने वाला कीडी नगरा या तो सार्वजनिक मार्ग पर डाला जाता है, या किसी पेड की जड में या किसी मकान की दीवारो या नींव में डाला जाता है। अब इन स्थानों पर या तो चींटियों का मरण है या उनके द्वारा खोखला कर दिये जाने के कारण पेड का मरण है या उस मकान का मरण है।’’
हम सब की सहमति को शेखर के तर्कों का वृत लीलता जा रहा था। लेकिन अब भी कमान पूरी तरह से अंजली भाभी ने संभाल रखी थी। अंतिम तो नहीं किंतु हमस ब की तरफ से एक यक्ष प्रष्न पूछा … ‘‘तो फिर चींटियों को कीडी नगरा? मेरा आषय है कि अन्नदान कहां करें?’’
संभवतः शेखर हमें यही बताना चाह रहे थे। वे हंसते हुए बोले … ‘‘ये हुआ लाख टके का प्रष्न। संक्षिप्त उत्तर है, एकांत में। और विस्तारित उत्तर है ऐसा स्थान जो ऊंचाई पर हो, निर्जन हो जिससे कि बारिष में उनके घर में पानी न भरे और लोगों के आने जाने से उनका जीवन संकट में न पडे। और सबसे बडी बात ये कि एक विषेष विधि अनुसार केवल रात में चींटियों के लिये अन्नदान किया जाए।’’
अंजली भाभी के तो जैसे प्रष्न ही समाप्त हो गये लेकिन मीना की उत्सुकता ने चोबोली राजकुमारी को बोलने पर विवष कर दिया। आंखों को संकुचित करते हुए कहा … ‘‘आप की किसी भी कथा का अंत भी होता है या नहीं? केले के पत्ते में से पत्ते की तरह चलने वाली रिले रेस कभी रूकेगी या नहीं ये तो पता नहीं लेकिन अब ये चींटियों के लिये केवल रात में अन्नदान की विषेष विधि भी बता ही दीजिये।’’
शेखर ने किसी तान्त्रिक की तरह रहस्यपूर्ण विधि बताते हुए कहा … ‘‘किसी शुभ दिन शुभ मुहूर्त में शुद्ध अंतःकरण और शुद्ध भावना से सात प्रकार के अन्न, घी, गुड, मिश्री और पानी वाला श्रीफल अर्थात नारीयल ले कर आएं। नारीयल की जटाओं को श्रद्धापूर्वक छील कर हटा दें और ऊपर से आधा इंच का सुराख कर उसका पानी निकाल कर धूप में रख दें जिससे नारीयल के अंदर की नमी कम हो जाए। सातों प्रकार के अन्न को समान मात्रा में दलिये की तरह आधा कूट लें और पर्याप्त मात्रा में घी, गुड और मिश्री मिला कर चूरमा बना लें। इस चूरमें कों सांयकाल सूरज जब आधा डूब कर क्षितिज को सुरमई कर दे तब उस नारीयल में दबा-दबा कर भरें और गीले आटे से एक बताषा उस के मुंह पर चिपका दें। बस, यही नारीयल रात्रि होने पर किसी को बताये बिना चुपचाप किसी निर्जन और ऊंचे स्थान पर सवा फिट गहरा गाड दें।’’
शेखर द्वारा बतायी गयी विधि रहस्यपूर्ण हो कर भी सरल और बोधगम्य थी। हम में से कोई स्पष्टीकरण मांगता उससे पहले ही शेखर ने मीना को लक्षित करते हुए कहा … ‘‘अब ये मत कहना कि इस में भी केले के पत्ते में पत्तों की रिले रेस है। कवच सहित नारीयल इसलिये कि चींटियों का चूरमा मिट्टी में न मिले, सवा फिट गहरा इसलिये कि चींटियां अपने नगर का निर्माण इस अन्नकोष के पास कर सके। सात प्रकार का अन्न सात दिनों में अलग अलग व्यंजनों का प्रतीक है। घी, गुड और मिश्री भोजन को रूचिकर बनाने के लिये है। बिना किसी को बताये जाना इसलिये की दान की चर्चा नहीं करनी है, ऊंचे और निर्जन स्थान का कारण हम बता चुके हैं। रात्री इसलिये कि वे चींटीभक्षी षिकारी पक्षियों से बच सके।’’
इतना कह कर शेखर ने एक लंबी सांस लेकर धीरे धीरे छोडने के बाद बोले … ‘‘यहां कीडी नगरा अध्याय समाप्त होता है। फिर भी किसी का कोई प्रष्न हो तो स्वागत है।’’
सब मौन थे लेकिन मेरे अंतर्मन में बीती रात के घटनाक्रम की उथल पुथल मची हुई थी और मैं अपने आप से लड रही थी। शेखर का व्यवहार तो मेरे रोम रोम में चींटियां बन कर रेंग रहा था किंतु मैं अनुभव कर रही थी कि वे चींटियां मेरी कोमल भावनाओं के अन्न में मिश्रित प्रेम के गुड और समर्पण की मिश्री के समीप आ-आ कर पुनः दूर जा रही थी। मैंने अनुभव किया कि मैं मेरी भावनाओं के पासंग में शेखर के व्यवहार का तुलनात्मक मूल्यांकन करते हुए आषा और निराषा के झूले में झूल रही थी। आषा की पेंग से झूले का आरोह जितना ऊंचा ले जाता निराषा का अवरोह भी उसी ऊंचाई तक ले जाता।
अनिष्चितता की इसी स्थिति में मेरे आंखों में मेरी मनस्थिति के प्रतिबिंब को शेखर ने इंगित करते हुए कहा … ‘‘हम देख रहे हैं कि अरूणिमा की कल्पना में चींटियों के नगर की अस्त व्यस्त गलियां में सुल्लु सांप की उपस्थिति ने कर्फ़्यू लगा दिया है। लेकिन अब कर्फ्यू हट चुका है देवी, अपनी शंका और प्रष्नों की चींटियों को निर्भय हो कर पौष्टिक ज्ञान का कीडी नगरा अर्थात घी, गुड और मिश्री मिश्रित चूरमे का संकलन करने दो।’’
मैंने अपनी सारी शक्ति बटोर कर शेखर के शब्दों को ही अपना अस्त्र बना कर कहा … ‘‘एक तो आप के कीडी नगरे का चूरमा सख्त नारीयल के दुर्भेद्य कवच को भेद पाना सीधी सरल चींटी के लिये कठिन है। दूसरे वह दुर्ग बहुत ऊंचे स्थान पर होने से वहां पहंुचने के प्रयास में चींटी बार बार गिर जाती है। इस सारी प्रक्रिया में क्या किसी गुप्त और भेद मंत्र का भी कोई प्रावधान है जिससे आप के उस कवचयुक्त नारीयल के भीतरी श्वेत आवरण की कोमल दीवारों में निमग्न रहने का सुख प्राप्त किया जा सके।’’
शेखर मेरा सांकेतिक आषय को बहुत अच्छे से समझ गये थे। मुझे संबोधित करते हुए बोले … ”लेकिन तुम ये क्यों भूल गयीं कि उस कठोर कवच युक्त दुर्ग में एक कोमल द्वार भी है जो केवल प्रेम की मिठास के बताषे से बंद है। रही मंत्र की बात! तो साधारण रूप से मंत्र किसी समस्या के समाधान का उपाय या विधि है। परंपरागत वेदिक अर्थ में मनः तारयति, इति मंत्रः अर्थात मन को सुखी करने वाली शक्ति ही मंत्र है। ध्वनि और प्रकाष विज्ञान के अर्थ में मंत्र अक्षरों और शब्दों के समूह से बना ध्वनि व प्रकाष तरंगों की आवृतियों का वो ऊर्जा समूह है जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड में नाद अर्थात ध्वनि और प्रकाष रूप में व्याप्त है। वेदिक मंत्रों के संदर्भ में ध्वनिविज्ञान को मिश्रित व तुलनात्मक दृष्टिकोण से देखें तो प्रत्येक अक्षर व शब्दों की आवृति एक प्रभाव उत्पन्न करती है जो किसी की भी मानसिक आवृति को सकारात्मक अथवा नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है। उदाहरण के लिये किसी को दी जाने वाली गाली में प्रयुक्त अक्षरों से निर्मित शब्द की आवृति सामने वाले व्यक्ति में क्रोध का निर्माण करेगी जबकि प्रेम पूर्वक कहे गये शब्दों की आवृति प्रेम का वातावरण तैयार करेगी। अंतिम बात ये कि मंत्रों से मन त्रस्त होता है क्योंकि मंत्रों का प्रभाव बंधनकारी है और बंधन किसी सुख या आनंद का कारक नहीं हो सकता।’’
शेखर ने सीघे मुझे लक्ष्य कर के कहा … ‘‘अब तक अगर ये समझ में आ गया हो कि कोई भी ऊर्जा दूसरी ऊर्जा के बिना सक्रिय नहीं होती तो यह भी समझ आ गया होगा कि कठोर कवच वाले नारियल के कीडी नगरा दुर्ग में बताषे के इस द्वार को खोलने के कुंजीमंत्र का नाम भी प्रेम ही है। किंतु प्रेम किसी मंत्र साधना से नहीं किंतु कठोर त्याग की श्रम साधाना से ही प्राप्त होता है। मंत्र साधना से एक काल्पनिक स्वर्ग की रचना तो हो सकती है किंतु उस स्वर्ग की कल्पना को साकार करने या चित्रपट्ट पर उतारने के लिये भी श्रम की साधना करनी ही होगी उसका अन्य कोई उपाय नहीं है।’’
मैं शेखर के ऊंचे भूमिगत कीडी नगर की अंधेरी गलियों में भटकते हुए बताषे का कोमल द्वार खोलने की प्रेममंत्र की कुंजी ढूंढ रही थी और तब ड्राइव कर रहे राघव भैय्या ने चुटकी लेते हुए कहा … ‘‘यार शेखर, तेरी बात अपने समझ में नहीं आयी क्योंकि इतने घुमाव फिराव तो देहरादून की पहाडियों में भी नहीं है जितना जलेबी की तरह उलझी हुई तुम्हारी बातों में है। क्यों राहुल, डाॅली?? सही कह रहा हूं ना?’’
राहुल ने बहुत मासूमियत से कहा … ‘‘हां अंकल, शेखर अंकल की बातें है तो जलेबी की तरह टेढी मेढी लेकिन जलेबी की तरह रसीली भी बहुत है।’’
राघव भैय्या ने डाॅली से पूछा … ‘‘और तुम क्या कहती हो डाॅली?’’
डाॅली ने दो टूक कहा ‘‘राघव अंकल आज तो सुल्लू सांप और चींटियों ने गुड का गोबर कर दिया। मैं तो सोच रही थी शेखर अंकल देहरादून के इन पहाडी रास्तों के सौंदर्य पर कुछ कविता सुनाएंगे जिसमें कल्पना ही नहीं यथार्थ भी होगा लेकिन …!
मीना ने डाॅली की बात का समर्थन करते हुए कहा … ‘‘हम राॅबर्स केव पहुंचने वाले हैं, आषा करती हूं कि वहां कोई सुल्लू सांप नहीं आयेगा और चींटी को बताषे का कोमल द्वार खोलने का कुंजीमंत्र मिल जाये। अब हम सब की ओर से कविराज से निवेदन है कि वे देहरादून के पहाडों के सौंदर्य का यथार्थ से मिश्रण कर सेंवईयों की खीर जैसी सीधी और मीठी मीठी अपनी कल्पना से हमारे कानों में रचनामृत बरसाएं।
शेखर ने कहा … ‘‘स्मरण रहे आप ने कल्पना और यथार्थ के मिश्रण की बात कही है बारिष की ठण्डी ठण्डी फुहारों को यथार्थ के तपते धरातल पर झुलसते देखिये …
रास्तों का टेढ़ापन
मंज़िल की ख़ूबसूरती का ऐलान है।
जैसे किसी नवयौवना षोड़षी का
शारीरिक सौष्ठव
बरबस ही दृष्टि को
स्तंभित कर देने वाली
कोई ऊंची नीची पहाड़ी डगर,
प्रियतमा के
भीगे भीगे कुंतल केष
़एक एक घूम पर
सौ सौ मधुषाला लिये हुए
कलकल गिरते
जीवनजल के झरने जैसे
षिखर छूते देवद्वार
प्रेमरस का प्याला पीये हुए
नागिन सी लहराती
बल खाती कोई नदिया
मंदाकिनी में अस्तित्व खो रही
चंद्रघट से बरसती चांदनी
घाटियों में मधुकुम्भ लिये
पनिहारिन तारिकाएं सो रही
सीधा सपाट
रास्ता तो बस
किसी विधवा की मांग का
सूनापन लिये चुप और उदास
किसी बटोही की तितिक्षा में
या फिर जैसे
सरपट दौड़ते भागते लोग
किसी चुड़ैल से
पीछा छुड़ाने को बेताब
अपनी मुक्ति की प्रतीक्षा में
अपनी मुक्ति की प्रतीक्षा में
राघव भैय्या ने गाडी के ब्रेक लगाते हुए कहा … ‘‘जलेबी आखिर जलेबी ही रहेगी।’’
फिर आसमान की तरफ हाथ जोडकर बोले … ’’ हे ईष्वर तेरा कोटि कोटि धन्यवाद कि राॅबर्स केव आ गया। यात्रीगणों से निवेदन है कृपया अपना अपना सामान उठा कर उतरें, जिससे कि यह सेवक गाडी पार्किंग में ले जा सके।’’
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