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आवाज़-ए-ज़मीर

इतिहास का बंद किवाड़

मने ठा कोनी कि कितना हमझेला न कितना गेळ पकड़ेला? क्यूं के सूंग्यो होबा के ताईं आंख, नाक अर् कान खुल्या होबा के साथ थोड़ी बुद्धि भी चायजे छे। इतिहास का बंद किवाड़, जाळी—झरोखां मं असी असी कहाण्यां किस्सा दब्योड़ा छे जां से आदमी बहुत कुछ सीख सकऽ छे। फेर भी कोई काईं पूछबो चावे तो वां को स्वागत छे।

ल्यो ताज़ा ताज़ा खरी खोटी …

हाथॉं रा आळगस हुयां मूंछ मूंडा मायां जाय।।
नाहर सिंहजी री मूंछ्या, ऊंदरा कुतर जाय।।

राणीजी तो बाट उडीके स्याळी सागऽ सोवता,
राजाधिराज महाराज ने नादर पातर भरमाय।।

जनख्या घूमं ड्योढ़ी मं करे कुंवराणी स बातां,
राणीजी ने राजराजेंद्र सूं खवासजी मिलवाय।।

गेळ भूलग्या गेल्याजी, डोटो लगा रियो टोरा,
आंधा पीसे पीसणो, तो क्यो न कूकरा खाय।।

रांड्यिो घूम रह्यो ज्यूं बावळी चिड़ी मोखळो रामो,
दाणा दुणकऽ दो माशा गांव में चें चें चेंचाय।।

कुम्हार गधा माळे बैठे नई, ऊंचतो फिरे बोझ,
रामजी रो आसरो गणेशजी न कुण समझाय।।

उमर बीतगी बावळा अब तो देख्यां देखी सीख,
फिरे एकलो खोड़लो क्यों न मोढ़ो बण जाय।।

अंत भलो तो सऽ भलो, लारे उड़ती फिरे धूळ,
सौ ऊंदरा खा अर् अब बिलाई हज पे जाय।।

पचरंगी पांच कबूतर तन तंबूरा में करे गुटरगूं,
ज़मीर रटे अलख निरंजन, नमो-नमो गोरक्षनाथाय।।
हुकम सिंह ज़मीर

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