मंदाकिनी पार्ट 25

चांदनी इतनी मासूम और निर्दोष थी कि मैं चाह कर भी चांदनी पर अपनी झुंझलाहट और खीझ को प्रकट नहीं कर सकी। मौसम और बादलों की लुका-छिपी मेरी आषा-निराषा को कभी मावठ की फुहारों से भिगो कर नम कर देती और थोड़ी में वो नमी हवा के साथ छितराई बदलियों की खिड़की से झांकते सूरज की गुनगुनी किरणों में नहा कर सूखती रही। नागेष ढौंढ़ियाल और शेखर नीचे आये तब तक क्लाउड़ एंड व्यू प्वाइंट के कर्मचारियों द्वारा नागेष ढौंढियाल के सहायक की पूर्व सूचना अनुसार चार लोगों के बैठने लायक एक वर्गाकार टेबल पर हमारा खाना लगाया जा चुका था। क्योंकि यह क्षेत्र वन्य जीवों के लिये संरक्षित अभ्यारण्य के लिये विकसित किया जा रहा था अतः खाना शुद्ध शाकाहारी था। मैं हाथ धो कर टेबल पर आयी तब तक चांदनी शेखर के बायीं तरफ और नागेष ढौंढ़ियाल दाहिनी ओर बैठ चुके थे। मेरे लिये शेखर के सामने बैठना उतना असहज नहीं था जितना उन दोनों में से किसी से मुझे शेखर के पास बैठने के लिये कहना।

खाना प्लेट्स में लेते हुए चांदनी ने अपनी चंचलता दिखाते हुए मुझे सम्बोधित कर कहा … ‘‘दीदी, बहुत पेट भर कर मत खाना, शांम को लखवाड़ में शरदोत्सव की दावत के लिये जगह रखना।’’

मैंने शेखर तक मेरा संदेष पहुंचाने की मंषा से चांदनी को उत्तर देते हुए कहा … ‘‘जब से तुम साथ हो, अवसर मेरे हाथ में आ कर निकल गया। तुम अगर साथ रही तो मुझे शांम को भी अवसर नहीं मिलेगा।’’

संभवतः शेखर मेरा आषय समझ गये थे, तब ही तो उन्होंने कहा … ‘‘कर्मठ लोग अवसर की प्रतीक्षा नहीं करते, अवसर तो बनाये भी जा सकते हैं। हां ये बात और है कि हाथ में आये हुए अवसर के निकल जाने पर हम अपने भाग्य को दोष दे कर अपनी अकर्मण्यता को अस्वीकार कर दें।’’

मैंने एक दिन पूर्व ईद के अवसर पर माधव भाईसाहब द्वारा आयोजित रात्री भोज में आये हुए लोगों के भी स्वयं के अकेलेपन से ले कर रात भर के अवसार और सुबह से ले कर दोपहर बीत जाने पर भी अवसर के निकल जाने को इंगित करते हुए कहा … ‘‘जो मेले में हो कर भी किसी कोने में अकेले रह जाते हैं वो किसी भी अवसर से क्या अपेक्षा करें? ख़ुषियों का कारवां उनके सामने होता है लेकिन उनके हिस्से में एक मौन रूदन के अतिरिक्त क्या शेष रह जाता है?

शेखर ने जैसे मेरा मार्ग प्रषस्त करते हुए कहा … ‘‘मेेले में अकेले वो होते हैं जो स्वयं से भी दूर चले जाते हैं। इसलिये स्वयं को कभी अकेला महसूस नहीं करना चाहिये और यदि कभी ऐसा हो तो किसी से कोई भी अपेक्षा किये बिना इस सृष्टी में स्वयं के विस्तार ‘सोऽहं’ का उसी प्रकार स्मरण करें जैसे किसी उपवन में बहुत से पुष्पों के मध्य या किसी विजन स्थान में कोई पुष्प अकेला हंसता है। प्रकाष तो वृक्षों की छाया से आच्छादित उस गहन वन में भी है जहां उस प्रकाष की किसी को आवयकता नहीं है। दूब, बुद्धी और प्रज्ञा कहीं भी और किसी भी स्थान पर मिल सकती है जैसे मां ज्वालाजी का ये मंदिर!! इसलिये किसी से अपेक्षा मत करो और अपना सर्वोत्तम व्यवहार प्रस्तुत करो।’’

मैंने अपने मन की बात कहने का प्रयास करते हुए कहा … ‘‘व्यवहार की उत्तमता मन की स्वस्थता पर निर्भर करती है और हृदय व मन अतीत की पहरेदारी में कुण्ठित होने से प्रेम, घृणा, उपेक्षा अथवा किसी भी मनोभाव को विस्मृत नहीं कर पाता। फिर यदि कोई इन हृदय व मन के मनोभावों को विस्मृत कर भी दे तो भी क्या कोई इन हृदय व मन के भावों से हुई अनुभूतियों को विस्मृत कर सकता है?’’

मेरी और शेखर की वार्ता की पृष्ठभूमि न जानते हुए भी मेरे प्रष्न का ये पड़ाव चांदनी और नागेष ढौंढ़ियाल के रूची का विषय हो कर उनका ध्यान आकृष्ट कर रही थी। चांदनी कुछ पूछने को उद्यत हुई लेकिन उससे पहले ही शेखर ने हृदय व मन के भावों की अनुभूती पर अपना दर्षन स्पष्ट करते हुए बहुत विस्तार से समझा कर कहा … ‘‘सामान्यतः मानव समूह का एक बड़ा वर्ग हृदय व मन को एक ही मानता है किंतु हृदय मानव शरीर में रक्त संचरण का अवयव हो कर मात्र एक मूर्त मांसपेषी है जिसमें किसी प्रकार के भाव अथवा उनकी अनुभूती नहीं होती। जबकि मन हृदय की एक अमूर्त और काल्पनिक प्रतिछाया है किंतु समस्त भावनाएं और अनुभूतियां इसी मन में होती है और मन की उन भावनाओं व अनुभूतियों का प्रभाव हृदय नामक इस मूर्त अवयव पर पड़ता है। विलक्षण बात यह है कि प्रेम, घृणा अथवा उपेक्षा की अनुभूती तो चेहरे के दर्पण में प्रतिबिंबित हो जाती है किंतु हृदय व मन की अदृष्य यवनिका के नेपथ्य में कर्तव्य व उत्तरदायित्व का चिंतन कोई नहीं देख पाता। इस विलक्षणता के क्रम में यह और विलक्षण बात है कि जिस प्रकार हृदय की तुलना में अदृष्य मन के भाव व अनुभूती चेहरे के दर्पण में मूर्त रूप ले लेती है उसके विपरीत इस अदृष्य यवनिका के नेपथ्य में पल्लवित कर्तव्य व उत्तरदायित्व का चिंतन अदृष्य ही रहता है।’’

मैं शेखर के शब्दों का मर्म समझने का प्रयास करते हुए उनके द्वारा बताये गये भावना और कर्तव्य के गुरूत्व को प्राथमिक क्रम में क्रमबद्ध कर रही थी कि नागेष ढौंढ़ियाल ने शेखर से कहा … ‘‘षेखर साहब, इतने गूढ़ विषय को आपने कितने सहज और सरल शब्दों में बताया, यह मेरे लिये ज्ञानवर्धक होने से अधिक अविष्वसनीय है। मैं तो आप को …।’’

चांदनी ने नागेष ढौंढ़ियाल की बात काटते हुए कहा … ‘‘उई बाबा रे बाबा, इतनी भारी-भारी बात और उस पर इतने भारी-भारी शब्द!! हजूर, मुझे तो सरल शब्दों में बताओ कि क्या प्रेम और प्रेम की अनुभूती को भुलाया जा सकता है?’’

चांदनी ने मेरे ही प्रष्न को शब्द दिये थे इसलिये मैंने उसकी तरफ कृतज्ञ और प्रषंसा के भाव से देखा लेकिन मेरा मन तुरंत ही विषाद से भर गया जब शेखर ने हंसते हुए अपने बाएं हाथ से उसका सर थपथपा कर कहा … ‘‘तुम जितनी छोटी हो, तुम्हारे पासंग में तुम्हारा प्रष्न बहुत बड़ा है लेकिन प्रेम और प्रेम की अनुभूती को भुलाने ना भुलाने से पहले यह जानना आवष्यक है कि ‘प्रेम’ क्या है?’’

चांदनी की चंचलता कम नहीं हुई बल्की शेखर का स्पर्ष पा कर उसने और अधिक उमंगित हो कर कहा … ‘‘अब छोटी कह ही दिया तो छोटे मुंह से बड़ी बात न कहलाओ हजूर!! अब आप ही बता दो!’’

शेखर के कथन अनुसार मेरे हृदय और मन की यवनिका के नेपथ्य में कहीं चिंतन पनप रहा था वहीं चांदनी और शेखर के मध्य बढ़ रहे संवाद के प्रत्येक शब्द के प्रहार से मन में उठ रहा क्रंदन मेरे चेहरे की तख्ती पर दर्द लिख रहा था। उस पर शेखर का मंद-मंद हंसते हुए चांदनी से कहा …‘‘पहले ये बताओ तुम्हारी प्रेम में आसक्ती है या उसकी अनुभूती में?’’

शेखर का प्रष्न एक था लेकिन हम तीनों के भाव अलग-अलग थे। मेरे मन में हलचल बढ़ रही थी, नागेष ढौंढ़ियाल चांदनी और शेखर के मध्य हो रहे संवाद का आंकलन कर दोनों के मध्य पनप रहे संबंध के भ्रूण का स्पंदन सुनने का प्रयास कर रहे थे लेकिन चांदनी तो दूध में गुड़ की तरह शेखर में घुलने को उत्साहित हो रही थी। उसने तपाक से पूछा … ‘‘अनुभूती के बिना प्रेम कैसा? ना तो प्रेम को भूला जा सकता है ना उसकी अनुभूती को …।’’

शेखर ने चांदनी की बात काटते हुए कहा … ‘‘यही समझ का अंतर है। प्रेम आसक्ती का नहीं बल्की त्याग का विषय और सच कहूं तो पर्यायवाची है या यों कहें कि एक दूसरे के पूरक और प्रेरक हैं तो भी कोई गलत नहीं होगा। इसे एक साधारण उदाहरण से समझा जावे तो अपने प्रिय के सुख के लिये किसी भी प्रकार के सुख का त्याग उस प्रिय के प्रति प्रेम के कारण ही तो होता है ना। मान लीजिये मुझे बहुत नींद आ रही है किन्तु माता-पिता, पत्नी, सन्तान या अपने मित्र के लिये जागते रहना पडे तो निद्रा के सुख का त्याग इन संबंधों के प्रति प्रेम के कारण ही तो है। अब इस प्रेम और त्याग पर थोड़ा और विचार करें तो प्रेम जब त्याग से विरत होता है तो केवल और केवल स्वार्थ को प्रतिबिंबित करता है। अधिक दूर ना जायें और अपने परिवेश में दृष्टीपात करें तो हम प्रत्येक घर में मृतक के परिजनों के रूदन में ऐसे ही स्वार्थ को आकार लेते देखते है जैसे कि ‘अब मेरे बच्चों का क्या होगा‘, ‘मेरे बुढापे की लाठी टूट गयी’।’’

इतना कह कर शेखर ने थोड़ा विराम लिया तो चांदनी ने झट से अवसर का लाभ उठाते हुए कहा … ‘‘आप बात को पहाड़ी रास्तों की तरह इतना घुमाते क्यों हैं हजूर!! मेरा प्रष्न है क्या प्रेम को भुलाया जा सकता है?’’

मेरा मन किया कि मैं चांदनी को गले लगा कर उसका मुंह चूम लूं लेकिन मैं ऐसा कर न सकी। हां मेरे मन की भावना मेरे चेहरे पर ज़रूर अपना प्रभाव छोड़ गयी। ऐसे में चांदनी के इस यक्ष प्रष्न पर शेखर ने मौन रह कर थोड़ी देर उसके चेहरे पर दृष्टी जमा कर उसके अंतर्मन में झांका और जैसे मुझे सम्बोधित करते हुए बहुत गम्भीरता से कहा … ‘‘ये प्रष्न केवल तुम्हारा नहीं है चांदनी!! तुमने तो बहुत निष्छलता से केवल इस प्रष्न को अपने शब्द और स्वर दिये हैं। तुम्हारे प्रष्न का सीधा उत्तर बहुत कठिन नहीं किंतु हृदय, मन और मस्तिष्क को आधात पहुंचा कर भावनाओं को आहत करने वाला है। इसलिये मैं सीधा उत्तर देने से बच रहा था किंतु तुमने मेरे सारे विकल्प बंद कर दिये हैं इसलिये सुनो!!! जिसने प्रेम में स्व के अर्थ अर्थात स्वार्थ को भुला दिया उसने ही सच्चा प्रेम किया लेकिन यदि उसने प्रेम के लिये प्रेम को भूलना नहीं सीखा तो उसने जीवन में प्रेम किया ही नहीं। यही प्रेम दर्षन है।’’

हम खाना समाप्त कर चुके थे और हाथ धो कर क्लाउड़ एंड व्यू प्वाइंट रिसॉर्ट के मुख्य द्वार की ओर जा रहे थे। खाना खाते हुए पूरी वार्ता में श्रोता बने रहे नागेष ढौंढ़ियाल ने जैसे धन्यवाद ज्ञापन देते हुए … ‘‘आपकी बातें और आपका प्रेम दर्षन कितनी तार्किक हो कर भी इतनी स्वप्निल हैं कि खाने के स्वाद से अधिक आप की बातों के रस में ना तो भूख का ध्यान रहा ना समय का। अब यहां से जॉर्ज एवरेस्ट हाउस की हवाई दूरी तो पांच सौ मीटर ही है लेकिन हमें इसी सड़क मार्ग से तीन किलोमीटर वापस हाथी पांव जा कर दाहिनी और दो किलोमीटर आना होगा। इस पांच किलोमीटर की यात्रा में आप मेरी एक जिज्ञासा को शांत करेंगे।

हम रिसॉर्ट के मुख्य द्वार तक पहुंच गये थे और नागेष ढौंढ़ियाल का कथन जारी था। उन्होंने आगे कहा … ‘‘आप कहते हैं कि प्रेम करो और उसकी अनुभूती को भी भूल जाओ, यह कैसे संभव है?’’

मुझे लग रहा था कि चांदनी और नागेष ढौंढ़ियाल को देवी ज्वालाजी ने निमित्त स्वरूप मेरा अधिवक्ता बना दिया था। मैं अवसर मिलने पर भी संभवतः शेखर से हमारे संबंध के बारे में दो टूक बात करने में असमर्थ रहती लेकिन इस अवसर पर चांदनी और नागेष ढौंढ़ियल प्रत्येक वो परिप्रष्न कर रहे थे जो मैं नहीं कर सकती थी।

रिसॉर्ट के मुख्य द्वार पर नागेष ढौंढ़ियाल का सहायक गाड़ी ले कर खड़ा था और मसूरी की पारंपरिक वेषभूषा में खड़े द्वारपाल ने अभिवादन किया तो शेखर ने उसको सम्मानपूर्वक संबोधित करते हुए पूछा … ‘‘क्या ये हमेंषा खुला ही रहता है?’’

द्वारपाल ने शेखर के संबोधन से हर्षित हो कर कहा … ‘‘ऊऊऊ शाबजी, नहीं हमेंषा खुला नहीं रखते शाबजी, सुबह खोलते हैं और शांम को बंद कर देते हैं।’’

एक बारगी तो नागेष ढौंढ़ियाल सहित मुझे और चांदनी को भी बड़ा अटपटा लगा कि शेखर ने नागेष ढौंढ़ियाल के प्रष्न का उत्तर नहीं दे कर विषयांतर करने का प्रयास किया है लेकिन जल्दी ही हमारी अवधारणा को खंडित करते हुए शेखर ने उस द्वारपाल को धन्यवाद दे कर नागेष ढौंढ़ियाल से कहा … ‘‘देखा ढौंढ़ियाल साहब, हमारा जीवन भी किसी द्वार के दो कपाट जैसा ही है जो सुबह अरूणिमा की पहली किरण के साथ विलग हो कर दिन भर के उन अपरिचित क्षणों के साथ आने वाले ठण्डे-गर्म झौंकों का स्वागत या उनसे संघर्ष करते हैं और शांम को बढ़ते धुंधलकों के साथ रात की चांदनी में परस्पर एक दूसरे के समीप आ कर इस तरह मिल जाते हैं जैसे कभी अलग ही नहीं हुए थे।’’

ड्राइविंग सीट पर बैठते हुए नागेष ढौंढ़ियाल ने कहा … ‘‘अद्भुत हैं आप!! जो भी सामने आया उसी को आधार बना कर उत्तर की भाषा में ढाल देते हैं। अब इस द्वार कपाटों की हमारे जीवन से संबद्धता भी बताएं। गाड़ी मैं चलाऊंगा जिससे कि इन पहाड़ी रास्तों पर आप का ध्यान न भटके।’’

नागेष ढौंढ़ियाल की बात पर शेखर ने बहुत अर्थपूर्ण दृष्टी से हमारी मेरी तथा चांदनी की ओर देखा। जैसे कहना चाह रहे हों कि दो-दो मोहिनियों के होते हुए कैम्पटी फॉल्स से यहां तक के पहाड़ी रास्तों में ध्यान नहीं भटका तो अब क्या भटकेगा। नागेष ढौंढ़ियाल भी इस मौन व्यंग को समझ गये थे तभी तो उन्होंने हंसते हुए गाड़ी स्टार्ट कर मुख्य मार्ग पर आ के कहा … ‘‘मेरी बात का बुरा मत मानियेगा लेकिन …!’’

शेखर ने नागेष ढौंढ़ियाल की बात पूरी होने से पहले ही कहना प्रारंभ किया और बोले … ‘‘हम मनुष्यों का जीवन दर्षन भी द्वार के इन दो कपाटों के सदृष्य ही है। दिन के चौबीस घंटों का चक्र हो या पूरे जीवन की यात्रा! सम्पूर्ण चक्र पेट और पेट से नीचे के दो कपाटों के मध्य इस चक्र की पुनरावृती मात्र है। प्रातः काल इन कपाटों के खुलते ही दिवस पर्यंत संघर्ष प्रारंभ होता है। दिन भर मनुष्य पेट भरने का संघर्ष करता है और पेट भरने के बाद पेट से नीचे की तृप्ती हो जाने पर संघर्ष के ये कपाट बंद कर अपने स्वप्निल संसार में पहुंच जाता है।’’

नागेश ढौंढ़ियाल ने बेनोग वन्य जीव अभ्यारण्य की चौकी पर अपने सहायक को उतार कर उनकी अपनी गाड़ हाथी पांव चौराहे पर लाने का निर्देष दिया और गाड़ी आगे बढाते हुए शेखर से कहा … ‘‘षेखर साहब इतनी संक्षिन्त लेकिन गूढ़ भाषा में आपने जीवन और प्रेम दर्षन को समझाया। मुझे नहीं पता कि चांदनी और अरूणिमा ने इसे कितना समझा और कितना नहीं। और मैं आपकी बात पर विष्वास करूं या ना करूं लेकिन मेरे अब तक के विष्वास का आधार आप ने खिसका दिया है।’’

सामने हाथी पांव चौराहे से नागेष ढौंढ़ियाल ने गाड़ी दाहिनी ओर जॉर्ज एवरेस्ट मार्ग पर घुमाई और इसी के साथ चांदनी का पहाड़ी गीत शुरू हो गया।

त्यार संग बांधी छू म्यै यो प्यार की डोर दगड़्या।।
मरी जूलो तरी जूलो नि छोड़ूलो त्यर हाथ दगड़िया।।
जब रूलो दूर सुवा, याद रौली संग तेरी दगड़्या।।
हिरदय मा नौं छू तेरो, आंखन् में अनवार तेरी दगड़्या।।
के बतू त्वै अपुणा दिले को हाल दगड़्या।।
काले राति से है मेरू यो हाल बेहाल दगड्या।।
म्यर मुख छोपी जानो दगड़्या।।
त्यर के बिगेड़ी जानो दगड्या।।
जनम जनेम को जोड़ी के नाता कियो कमाल दगड़्या।।
जो दी दिनी तू आपणो यो रेशमी रुमाल दगड्या।।

अर्थात
ओ साथी, मैंने तेरे साथ ये प्यार की डोर बांधी है। अब मरूं या पार उतरूं मैं तेरा हाथ नहीं छोडूंगी। हे प्रिय जब तुम दूर रहोगे तो तुम्हारी याद मेरे साथ रहेगी, मेरे हृदय में तुम्हारा नाम है आंखों में तुम्हारी तस्वीर है। मैं तुम्हें अपने दिल का हाल क्या बताऊं, कल रात से मेरा हाल बेहाल हुआ है। अगर तुम मेरी तरफ देख लो तुम्हारा क्या बिगड़ जायेगा, हमारा ये जन्म-जन्मांतर का कमाल का रिष्ता जुड़ा है, यदि तुम अपना रूमाल मुझे दे दो तो तुम्हारा क्या बिगड़ जाएगा।
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